डॉ. रविंद्र मलिक, चंडीगढ़ : बच्चों में सेप्सिस बीमारी वो कंडीशन है, जब शरीर के टिश्यूज में इन्फेक्शन फैल जाता है। इन्फेक्शन से लड़ते हुए शरीर के अन्य अंगों को भी नुकसान होने लगता है। अगर इन्फेक्शन कंट्रोल नहीं किया गया, तो यह और गंभीर हो जाता है, इस स्टेज को सेप्टिक शॉक कहते हैं। इसमें कई बार बच्चे की जान भी चली जाती है। इस अवस्था में दवाइयों का असर पहले की तुलना में कम हो जाता है। रक्त में इन्फेक्शन फैल जाता है। इसके अलावा किडनी, लंग और अन्य अंगों पर इसका असर होने लगता है। बीमारी बढ़ने पर एंटीबायोटिक दवाइयां भी काम करना बंद कर देती हैं। रक्त में भी इन्फेक्शन बढ़ जाता है। इसको लेकर दो दिवसीय सेमिनार का आयोजन हुआ। पीजीआइ के एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर (एपीसी) में डॉ. अरुण बंसल और डॉ. जयश्री ने प्रेजेंटेशन दी। 400 मरीज सेप्सिस डिजीज के आते हैं हर महीने

पीजीआइ के एडवांस्ड पीडियाट्रिक सेंटर की इमरजेंसी में करीब 15 सौ से 2 हजार मरीज हर महीने इलाज के लिए आते हैं। इनमें से करीब 300 से 400 को सेप्सिस डिजीज होती हैं। इनमें में से करीब 80 से 100 को सेप्टिक शॉक डिजीज हो जाती है। इनको क्रिटिकल केयर मिलनी बेहद जरूरी है। सेप्टिक शॉक से 100 मरीजों में से हर महीने करीब 20 से 30 मौत

बच्चों में सेप्सिस बीमारी के सेप्टिक शॉक में बदले जाने पर मरीज के लिए खतरा बढ़ जाता है। पीजीआइ में करीब 100 मरीज हर महीने इमरजेंसी में इलाज के लिए आते हैं। इनमें से औसतन 20 से 30 मरीजों की मौत हो जाती है। पीजीआइ एक्सप‌र्ट्स की मानें, तो यूएस में बीमारी से बच्चों की मौत का औसत आंकड़ा 100 में करीब 20 मरीज का होता है। इंडिया में यह 30 तक पहुंच जाता है। बांग्लादेश और पाकिस्तान में यह संख्या 50 तक है। लंग और दिमाग को सबसे ज्यादा नुकसान

सेप्सिस बीमारी के सेप्टिक शॉक में तब्दील होने पर खतरा पहले की तुलना में बढ़ जाता है। इसमें सबसे ज्यादा असर शरीर में फेफड़ों और दिमाग पर होता है। फेफड़ों में इन्फेक्शन फैलने लगता है, जोकि कई बार जानलेवा साबित होता है। किडनी व अन्य अंग भी प्रभावित होते हैं।

ये हैं लक्षण

-बच्चे का सुस्त होना

-चेहरे पर पीलापन या सफेद होना

-सांस लेने में तकलीफ या बेहोश होना

-पेशाब करने में दिक्कत होना

-पेट खराब रहना

-पीलिया होना या उल्टी आना ये हैं बीमारी फैलने के कारण

-हाईजीन व सफाई नहीं रखना

-एक मरीज से दूसरे में फैलना

-खांसी या सांस या छींक से दूसरों में होना

-बीमारी होने पर लापरवाही बरतना

-डॉक्टर्स को नहीं दिखाना बीमारी सांस या खांसी से भी दूसरों बच्चों में यह बीमारी होती है। सफाई रखनी जरूरी है। सेप्टिक शॉक में मरीज को दाखिला करना जरूरी है। हर 100 में से करीब 20 से 30 मरीजों की मौत हो जाती है। लक्षण दिखते ही तुरंत डॉक्टर से मिलें।

डॉ. अरुण बंसल, एपीसी, पीजीआइ

By Jagran