राजजीत को लेकर पंजाब पुलिस में हो गई थी दो फाड़, कोर्ट में आमने-सामने आए थे आला अफसर; क्या था मामला?
बर्खास्त एआईजी राजजीत सिंह हुंदल का ड्रग केस सिर्फ उनकी भूमिका तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने पंजाब पुलिस के आला अफसरों के बीच गहरा टकराव पैदा कर दिया था।

राजजीत को लेकर पंजाब पुलिस में हो गई थी दो फाड़ (फाइल फोटो)
HighLights
ड्रग केस में बर्खास्त एआईजी राजजीत सिंह हुंदल की भूमिका
पंजाब पुलिस के आला अफसरों में गहराया आपसी टकराव
मुख्यमंत्री को पुलिस अधिकारियों को अनुशासन की हिदायत देनी पड़ी
रोहित कुमार, चंडीगढ़। बर्खास्त एआइजी राजजीत सिंह हुंदल का ड्रग केस सिर्फ एक पुलिस अधिकारी की भूमिका की जांच तक सीमित नहीं रहा था, बल्कि इसने पंजाब पुलिस के आला अफसरों के बीच ऐसा टकराव पैदा कर दिया था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को पुलिस अधिकारियों को सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी नहीं करने और अनुशासन व कमांड की व्यवस्था बनाए रखने की हिदायत देनी पड़ी थी।
एक तरफ तत्कालीन एसटीएफ प्रमुख एडीजीपी हरप्रीत सिंह सिद्धू राजजीत की भूमिका और इंस्पेक्टर इंदरजीत सिंह से उसके संबंधों की जांच आगे बढ़ा रहे थे, तो दूसरी तरफ राजजीत ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाकर सिद्धू पर ही पक्षपात के आरोप लगाए।
बाद में जांच कर रहे डीजीपी सिद्धार्थ चट्टोपाध्याय और तत्कालीन डीजीपी सुरेश अरोड़ा व डीजीपी इंटेलिजेंस दिनकर गुप्ता के बीच भी विवाद कोर्ट तक पहुंच गया।
इंदरजीत की गिरफ्तारी से खुला मामला
मामला उस समय गहराया जब एसटीएफ ने नशे के मामलों की जांच में इंस्पेक्टर इंदरजीत सिंह की भूमिका पर सवाल उठाए। इंदरजीत को करीब चार किलो हेरोइन समेत गिरफ्तार किया गया था।
एसटीएफ की जांच में उसके कई मामलों में भूमिका और नशा तस्करी से जुड़े आरोप सामने आए। इसी दौरान राजजीत सिंह का नाम भी सामने आया। आरोप था कि राजजीत ने इंदरजीत को संरक्षण दिया और उसकी तैनाती व पुलिस सेवा में आगे बढ़ने में मदद की।
राजजीत ने इन आरोपों को खारिज करते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की और कहा कि विभागीय राजनीति के कारण उन्हें निशाना बनाया जा रहा है।
इसके बाद हाई कोर्ट ने मामले की जांच के लिए एसआइटी गठित की। इसमें डीजीपी सिद्धार्थ चट्टोपाध्याय, प्रबोध कुमार और कुंवर विजय प्रताप सिंह शामिल थे।
जांच ने बढ़ाया अफसरों के बीच टकराव
जांच के दौरान चट्टोपाध्याय ने कोर्ट में राजजीत की भूमिका को लेकर गंभीर बिंदु सामने आने की बात कही। इसके बाद विवाद पुलिस के शीर्ष स्तर तक पहुंच गया।
चट्टोपाध्याय ने हाई कोर्ट में आरोप लगाया कि डीजीपी सुरेश अरोड़ा और डीजीपी इंटेलिजेंस दिनकर गुप्ता उन्हें चड्ढा आत्महत्या मामले में निशाना बना रहे हैं, ताकि डीजीपी पद की दौड़ से बाहर किया जा सके।
इसके जवाब में पुलिस मुख्यालय में खींचतान और बढ़ी। स्थिति यहां तक पहुंची कि अधिकारियों को सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे के खिलाफ जाने से रोकने के लिए मुख्यमंत्री स्तर पर हस्तक्षेप करना पड़ा।
मेडल की सिफारिश भी बनी विवाद
राजजीत का विवाद यहीं नहीं रुका। मोगा में टारगेट किलिंग के मामलों को सुलझाने में भूमिका के आधार पर उनका नाम पुलिस मेडल के लिए भेजा गया।
मीडिया में मामला सामने आने के बाद यह सिफारिश वापस ले ली गई। उस समय भी एक अधिकारी ने राजजीत को पूरे टकराव का कारण नहीं बल्कि शीर्ष स्तर की खींचतान में एक मोहरा बताया था।
फर्जी डेथ सर्टिफिकेट का मामला भी उठा
2012 में राजजीत की बेटी द्वारा मेडिकल कालेज में आरक्षित कोटे के तहत दाखिले के लिए कथित तौर पर उनके नाम का डेथ सर्टिफिकेट इस्तेमाल किए जाने का मामला सामने आया। प्रमाणपत्र में राजजीत को आतंकियों के साथ मुठभेड़ में मृत बताया गया था।
जांच के बाद प्रमाणपत्र वापस लिया गया। राजजीत ने इसे गलतफहमी बताते हुए कहा था कि प्रास्पेक्टस में दिए नमूने के कारण भ्रम हुआ। इसके बावजूद कुछ महीनों बाद उन्हें मेधावी सेवा के लिए पुलिस मेडल मिला।
राजजीत अकाली और कांग्रेस, दोनों सरकारों के दौरान एसएसपी जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे। बाद में मोगा से उनका तबादला हुआ। ड्रग केस की जांच आगे बढ़ी और वर्षों बाद पंजाब सरकार ने एसआइटी की रिपोर्टों के आधार पर उन्हें बर्खास्त कर दिया।
इसके बाद वह लंबे समय तक जांच एजेंसियों की पकड़ से बाहर रहे। अब उनकी गिरफ्तारी ने वर्षों पुराने उस विवाद को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है, जिसकी शुरुआत एक ड्रग केस से हुई थी और जिसकी गूंज पंजाब पुलिस के शीर्ष स्तर तक पहुंच गई थी।
