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कम उम्र के बच्चे की कस्टडी मां के पास रहना सामान्य नियम, ढाई साल की बच्ची के मामले में हाईकोर्ट का फैसला

Published: Fri, 11 Sep 2026 07:44 PM (IST)

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने ढाई साल की बच्ची की कस्टडी मां को सौंपने का अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा ...और पढ़ें

हाईकोर्ट ने ढाई साल की बच्ची की कस्टडी को लेकर अहम फैसला सुनाया। (एआई जनरेटेड फोटो)

हाईकोर्ट ने ढाई साल की बच्ची की कस्टडी को लेकर अहम फैसला सुनाया। (एआई जनरेटेड फोटो)

HighLights

  1. कम उम्र के बच्चे की कस्टडी सामान्यतः मां के पास रहती है।

  2. मां के प्यार और देखभाल की जगह कोई नहीं ले सकता।

  3. हाईकोर्ट ने ढाई साल की बच्ची पिता से मां को सौंपी।

राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने ढाई साल की बच्ची की कस्टडी को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए उसे उसकी मां को सौंपने का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति शालिनी सिंह नागपाल ने कहा कि कानून के तहत पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे की कस्टडी सामान्य तौर पर मां के पास रहनी चाहिए।

अदालत ने कहा कि इतनी छोटी बच्ची के लिए मां की देखभाल, स्नेह और भावनात्मक जुड़ाव का कोई विकल्प नहीं हो सकता। हाई कोर्ट ने पिता को 22 सितंबर को बच्ची मां को सौंपने का निर्देश दिया है।

पंजाब यूनिवर्सिटी में वरिष्ठ सहायक के पद पर कार्यरत महिला ने हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर बताया कि उसकी शादी आठ जुलाई 2022 को हुई थी। दोनों की यह दूसरी शादी थी।

महिला के अनुसार शादी के कुछ समय बाद ही पति और ससुराल वालों ने दहेज को लेकर उसे परेशान करना शुरू कर दिया और उसकी तनख्वाह पति के खाते में जमा कराने का दबाव बनाया।

महिला ने मारपीट, गर्भावस्था के दौरान उपेक्षा और धमकियां देने के आरोप भी लगाए। वह 12 सितंबर 2025 को ससुराल छोड़कर मायके आ गई थी।

उसका आरोप था कि 20 अप्रैल 2026 को पति उसकी ढाई साल की बेटी को मायके से यह कहकर ले गया कि शाम तक वापस छोड़ देगा, लेकिन बाद में बच्ची को लौटाने से इनकार कर दिया। महिला ने आरोप लगाया कि बच्ची को वापस देने के लिए उससे 15 से 20 लाख रुपये की मांग भी की गई।

पिता की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि वह बच्ची का जैविक पिता और प्राकृतिक संरक्षक है। इसलिए उसकी कस्टडी को अवैध नहीं कहा जा सकता। उसके अनुसार महिला नौकरी करती है और बच्ची की पर्याप्त देखभाल के लिए उसके पास समय नहीं है।

हाईकोर्ट ने कहा कि नाबालिग की कस्टडी के मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात बच्चे का कल्याण है। केवल यह कहकर याचिका खारिज नहीं की जा सकती कि पक्षकार के पास किसी अन्य कानून के तहत वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है।

पिता की ओर से मां की मानसिक बीमारी का दावा भी ठोस प्रमाण से साबित नहीं हुआ। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि महिला करीब 13 वर्षों से पंजाब यूनिवर्सिटी में नियमित नौकरी कर रही है। कोर्ट ने बच्ची को मां को सौंपने का आदेश दिया।

आदेश का पालन नहीं होने पर मोहाली के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और संबंधित थाना प्रभारी को बच्ची की कस्टडी मां को दिलाने के निर्देश दिए गए हैं।