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पंजाब में डी-सिल्टिंग रोकी तो आएगी तबाही, एनजीटी में सरकार का बड़ा तर्क; 2025 की बाढ़ का दिया हवाला

Published: Tue, 06 Oct 2026 10:16 AM (GMT+05:30)

पंजाब सरकार ने एनजीटी में कहा है कि बाढ़ प्रबंधन और नदियों की क्षमता बहाल करने के लिए गाद निकालना ...और पढ़ें

डी-सिल्टिंग रोका तो बढ़ेंगी मुश्किलें।

डी-सिल्टिंग रोका तो बढ़ेंगी मुश्किलें।

HighLights

  1. बाढ़ प्रबंधन हेतु गाद निकालना व्यावसायिक खनन नहीं

  2. 2025 की बाढ़ का हवाला देकर डी-सिल्टिंग की आवश्यकता बताई

  3. अवैध खनन की आड़ में डी-सिल्टिंग की अनुमति नहीं

रोहित कुमार, चंडीगढ़। पंजाब सरकार ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में कहा है कि बाढ़ प्रबंधन, नदियों और ड्रेनों की जलप्रवाह क्षमता बहाल करने तथा भविष्य की आपदाओं से बचाव के लिए की जाने वाली वास्तविक डी-सिल्टिंग (गाद निकालने) और ड्रेजिंग को केवल इसलिए व्यावसायिक खनन नहीं माना जा सकता।

दरअसल निकाली गई सामग्री का आर्थिक मूल्य हो सकता है। राज्य सरकार ने यह पक्ष पंजाब में डी सिल्टिंग पर पूरी तरह रोक लगाने की मांग से संबंधित आवेदन की सुनवाई के दौरान रखा।

सरकार ने कहा कि डी-सिल्टिंग पर ब्लैंकेट रोक लगाने से उसके कई जरूरी वैधानिक कार्य प्रभावित होंगे। इनमें बाढ़ प्रबंधन, नदियों और ड्रेनों की क्षमता बहाल करना, तटबंधों की सुरक्षा तथा भविष्य में बाढ़ से होने वाली आपदाओं की रोकथाम शामिल है।

पंजाब ने एनजीटी के समक्ष स्पष्ट किया कि रखरखाव, पुनर्बहाली और आपदा प्रबंधन के लिए की जाने वाली डी-सिल्टिंग और ड्रेजिंग को खनिजों के व्यावसायिक दोहन और बिक्री के लिए किए जाने वाले खनन से अलग रखा जाना चाहिए।

हालांकि, राज्य सरकार ने यह भी स्वीकार किया कि पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिसूचना, 2006 के परिशिष्ट-IX के आइटम-7 में मुख्य प्रबंधन के लिए ड्रेजिंग और डी-सिल्टिंग को दी गई छूट का इस्तेमाल व्यावसायिक खनन को छिपाने के लिए नहीं किया जा सकता।

सरकार ने कहा कि उसका इरादा ऐसी किसी गतिविधि को अनुमति देने का नहीं है, जो वास्तविकता और प्रभाव में व्यावसायिक खनन हो, लेकिन उसे डी-सिल्टिंग के नाम पर कराया जाए।

2025 की बाढ़ का दिया उदाहरण

पंजाब सरकार ने अपने पक्ष में वर्ष 2025 में आई अभूतपूर्व बाढ़ का हवाला दिया। सरकार के अनुसार, 2025 के मानसून में पंजाब में 622.1 मिलीमीटर बारिश हुई, जो सामान्य से 41 प्रतिशत अधिक थी। इस दौरान सतलुज, ब्यास, रावी और घग्गर नदी तंत्र में भी असाधारण रूप से अधिक पानी आया। बाढ़ के कारण नदी चैनलों, ड्रेनों, तटबंधों और बाढ़ प्रबंधन से जुड़े अन्य ढांचों को नुकसान पहुंचा।

राज्य ने यह भी बताया कि 16 सितंबर 2025 के केंद्रीय गृह मंत्रालय के पत्र में केंद्रीय अंतर-मंत्रालयी टीम द्वारा स्थिति का आकलन किए जाने का उल्लेख था। टीम ने व्यावहारिक तौर पर स्थिति को 'गंभीर प्रकृति की आपदा' माना था।

इसके बाद जल संसाधन विभाग ने नदियों, ड्रेनों और अन्य जलमार्गों की जलप्रवाह क्षमता को बहाल करने और बनाए रखने के लिए निवारक तथा सुधारात्मक कार्य शुरू किए। साथ ही बाढ़ प्रबंधन से जुड़े ढांचों को मजबूत करने के काम भी किए गए। रा

ज्य ने कहा कि ये कार्य उसकी वैधानिक जिम्मेदारियों का हिस्सा हैं और पंजाब कैनाल एंड ड्रेनेज एक्ट, 2023 की धारा 38 के तहत भी ऐसे कार्य किए जाते हैं।

एनजीटी के अंतरिम निर्देश के बाद एसओपी

पंजाब ने एनजीटी के अंतरिम निर्देश का भी उल्लेख किया, जिसमें सरकारी एजेंसियों या अन्य माध्यमों से मेंटेनेंस, अपकीप और डिजास्टर मैनेजमेंट के लिए डी-सिल्टिंग की अनुमति दी गई है।

इसकी शर्त यह है कि इसका इस्तेमाल व्यावसायिक रेत खनन के लिए नहीं होना चाहिए। इसी निर्देश के बाद जल संसाधन विभाग ने 15 जून 2026 को आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत महत्वपूर्ण स्थानों पर नदी की जलप्रवाह क्षमता बहाल करने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की।

इसमें महत्वपूर्ण स्थलों की पहचान, काम शुरू करने से पहले तकनीकी आकलन और राज्य तकनीकी मूल्यांकन समिति से स्वीकृत विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) के आधार पर काम कराने का प्रावधान किया गया।

डी-सिल्टिंग की आड़ में नहीं होने देंगे अवैध खनन

विभाग के मुख्य अभियंता/ड्रेनेज-कम-माइनिंग ने 99 डी-सिल्टिंग साइटों की पहचान कर उनकी जिला स्तर की सूची 16 जून को उपायुक्तों को भेजी। इन स्थानों पर आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत जमीन मालिकों या एसओपी के अनुसार काम कराने की व्यवस्था की गई।

इसके बाद 16 जुलाई को विभाग ने 37 और साइटों की सूची भेजी। इसमें वॉल्यूम-शेयर और प्राइस-बिड टेंडर मॉडल वाले स्थान शामिल थे। साथ ही उन साइटों को भी सूची में रखा गया, जिन्हें पहले जमीन मालिकों को आवंटित किया गया था, लेकिन विरोध या अन्य कारणों से वहां काम रुक गया था।

उपायुक्तों को महत्वपूर्ण नदी स्थलों पर जरूरत का आकलन करने और जमीन मालिकों अथवा एसओपी के तहत डी-सिल्टिंग का काम कराने के निर्देश दिए गए।

राज्य सरकार ने एनजीटी को स्पष्ट किया कि बाढ़ प्रबंधन और आपदा से बचाव के लिए ऐसे कार्यों को व्यावसायिक खनन के बराबर नहीं रखा जा सकता, लेकिन डी-सिल्टिंग की आड़ में होने वाले वास्तविक व्यावसायिक खनन की अनुमति भी नहीं दी जाएगी।

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