चंडीगढ़, इंद्रप्रीत सिंह। पंजाब के आढ़ती एसोसिएशन के दोनों ग्रुप किसानों को उनकी फसल खरीद की सीधी अदायगी के लिए मान गए हैं और मंडियों में गेहूं की खरीद करने को वे तैयार हो गए हैं। केंद्रीय खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री पीयूष गोयल ने किसानों को उनकी फसल खरीद की अदायगी सीधे उनके खाते में करने के मामले में जिस तरह का सख्त स्टैंड लिया, उससे यह साफ हो गया था कि इस मामले में इस बार कोई ढील नहीं बरती जाएगी।

दरअसल पिछले एक दशक से किसानों और सरकारी एजेंसियों की यह मांग थी कि किसानों को उनकी फसल की अदायगी खरीद एजेंसियां सीधा उन्हें ही करें। तीन खेती कानूनों के विरोध के बीच आढ़तियों से अदायगी जैसा बड़ा काम वापस ले लेना मंडियों में फसल खरीद के लिए बने सिस्टम में कोई छोटा बदलाव नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि इस बदलाव को लेकर पहले कोई कदम उठाया नहीं गया। केंद्र सरकार ने पिछले एक दशक में कई बार प्रयास किए, लेकिन खरीद के मौके पर आढ़तियों की धमकी के सामने केंद्र और राज्य सरकारें, दोनों ही घुटने टेक देतीं। राज्य के मात्र 25 से 30 हजार आढ़ती पूरे सिस्टम पर भारी पड़ जाते। कोई यह जानने का प्रयास भी नहीं करता कि किसान क्या चाहते हैं?

किसी समय जब बैंकिंग व्यवस्था ग्रामीण स्तर तक नहीं थी और किसान भी कम पढ़े-लिखे थे तब यह सिस्टम ठीक था। किसानों को अपने आढ़तियों पर सबसे ज्यादा भरोसा होता था, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। बैंकों का दायरा बढ़ गया है। उनका काम डिजिटलाइज हो चुका है। हालांकि आढ़ती इसकी तुलना नाखून-मांस का रिश्ता खत्म करने से कर रहे हैं। दावा कर रहे हैं कि वे समय-समय पर किसानों की वित्तीय मदद करते हैं। देखा जाए तो आज के दौर में इन दोनों दलीलों का कोई अर्थ नहीं है। पहली बात यह कि आढ़ती और किसानों के बीच नाखून-मांस का रिश्ता कभी नहीं रहा। वास्तव में किसान-आढ़ती के बीच दुकानदार और ग्राहक के रिश्ते हैं। दोनों अगर चाहें तो इसे बनाए रख सकते हैं। उन्हें ऐसा करने से कौन रोक रहा है। दूसरा, वित्तीय मदद करने के बदले आढ़ती किसानों से 18 से 24 फीसद ब्याज लेते हैं। इसी किसान ग्राहक के जरिये वे अपने अन्य व्यापार भी चलाते हैं।

पंजाब के तीन विश्वविद्यालयों ने किसानों की आत्महत्याओं पर जो सर्वे किया है उसमें एक बिंदू यह भी सामने आया था कि किसानों को उनकी फसल की पूरी अदायगी नहीं मिलती। उनके घर और खेती की जरूरतों का सामान दिलाने के लिए आढ़ती उन्हें पíचयां दे देते हैं, जिसके जरिये वे आढ़ती की बताई हुई दुकानों पर जाकर सामान लेते हैं। उनके पास सामान की कीमत कम करवाने की गुंजाइश नहीं होती। यानी आढ़ती किसानों की फसल बिकवाकर सरकार से 2.5 फीसद कमीशन, उनकी वित्तीय सहायता करके 24 फीसद ब्याज और उन्हें अपने ही रिश्तेदारों की दुकानों पर भेजकर इन धंधों से अलग कमाई करते हैं।

अब हर किसान को बैंकों ने किसान क्रेडिट कार्ड दिया हुआ है। उनकी लिमिट किसानों की आदमनी के आधार पर तय नहीं की गई है, बल्कि उनकी जमीन की कीमत के आधार पर तय की गई है। किसान जब चाहें व्यापारियों की तरह अपनी तय लिमिट से पैसा निकलवा सकते हैं और फसल आने पर उसे जमा करवा सकते हैं। जब उनकी फसल की कमाई सीधे उनके खाते में आएगी तो बैंकों से उनका संबंध और मजबूत होगा। किसानों की आत्महत्याओं को लेकर जितने भी सर्वे हुए हैं उनमें सीधी अदायगी की बात की गई है। चैंबर ऑफ पंजाब फारमर्स ने इस मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की थी जिसमें अदालत ने 2013 में इस मामले में राज्य सरकार से कोई फैसला लेने को कहा था। तब की अकाली-भाजपा सरकार ने एक बीच का रास्ता निकाला। कहा कि फसल बेचते समय किसान खुद तय करें कि उन्हें भुगतान आढ़तियों से लेना है या सीधे खरीद एजेंसी से। अगर आढ़ती से लेना है तो आढ़ती इसकी अदायगी किसानों को चेक से करेंगे, पर आढ़तियों के दबाव के चलते यह सिस्टम ज्यादा चल नहीं सका। देनदारी फिर उनके माध्यम से ही होने लगी।

साल 2021 के रबी सीजन में एक बड़ा बदलाव हुआ है। किसानों को उनकी फसल की कीमत उनके खाते में तो मिलेगी ही, पर असल बदलाव उस समय होगा जब फसल बेचते समय खरीद पोर्टल पर किसानों से लैंड रिकॉर्ड भी लिया जाएगा। इसके जरिये पता चलेगा कि पंजाब में कितने लोग हैं जो खेती नहीं करते, उसे ठेके पर देकर अपनी आय को टैक्स फ्री बनाने में लगे हुए हैं। जो किसान अपनी जमीन पर खेती ही करते हैं उन्हें लैंड रिकॉर्ड देने में कोई दिक्कत नहीं होगी, पर बहुत से लोग इसका विरोध कर रहे हैं। आखिर ऐसा क्या है जिसकी पर्देदारी है?

[स्टेट ब्यूरो प्रमुख, पंजाब]

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