जेएनएन, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने अग्रिम जमानत को लेकर सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का अनुसरण न करने पर लुधियाना के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की योग्यता पर सवाल उठाया है। आदेश दिया है वह अग्रिम जमानत देने से संबंधित कम से कम सुप्रीम कोर्ट के दस निर्णयों को पढ़कर दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 438 के तहत एक न्यायाधीश के अधिकार क्षेत्र के अभ्यास पर लिखित सारांश 30 दिनों के भीतर निदेशक, चंडीगढ़ न्यायिक अकादमी के समक्ष प्रस्तुत करें।

हाई कोर्ट के जस्टिस अरविंद सांगवान ने यह आदेश अमरजीत सिंंह व अन्य दो पुलिस अधिकारियों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए जारी किया है। तीन पुलिस अधिकारियों को कथित हिरासत में हत्या के मामले में पिछले 15 वर्षों से अनावश्यक आपराधिक अभियोजन का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश को इस बात की जानकारी दी गई थी कि हिरासत में जिस व्यक्ति की हत्या की बात की गई है वह जीवित था, लेकिन यह जानते हुए भी उन्होंने उनकी अग्रिम जमानत अर्जी को खारिज कर दिया।

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हाई कोर्ट ने माना कि लुधियाना के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश व प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने में विफल रहे हैं। हाई कोर्ट ने कहा कि एक मृत को जिंदा पाया गया। इसके बाद भी याचिकाकर्ताओं की 15 साल लंबी पीड़ा निचली कोर्ट द्वारा दी गई। हाई कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि न्यायिक अकादमियों द्वारा न्याय पर सत्र आयोजित करने के बाद भी यह दशा है।

दायर याचिका में हाई कोर्ट को बताया गया कि उनके खिलाफ 2005 में हरदीप सिंह की हिरासत में हत्या का मामला दर्ज किया गया था। हरदीप सिंह को मादक पदार्थों की तस्करी के आरोप गिरफ्तार किया था। हरदीप के पिता नागेंदर ने कोर्ट में याचिका दायर कर हरदीप को पुलिस द्वारा अवैध रूप से रखने का आरोप लगाया था। बाद में एक तालाब में मिले शव की पहचान हरदीप के रूप में की गई थी। इसके बाद नागेंदर ने पुलिस अधिकारियों पर उसके बेटे की हिरासत में हत्या करने का आरोप लगाया था।

हिरासत में हत्या का था आरोप, जांच में पता चला हरदीप जिंदा है

बाद में जांच में पाया गया कि तलाब में मिली लाश हरदीप की नहीं थी। ट्रायल कोर्ट के समक्ष विशेष जांच दल द्वारा दी गई रिपोर्ट में भी कहा गया कि कि हरदीप मरा नहीं था, बल्कि मजिस्ट्रेट के पास ले जाते समय पुलिस हिरासत से भाग गया था। इसके बावजूद 2019 में मजिस्ट्रेट ने गैर-जमानती वारंट के साथ याचिकाकर्ताओं का समन किया। इसके बाद याचिकाकर्ताओंने हाई कोर्ट में भी याचिका दायर की और सुनवाई के दौरान पुलिस आयुक्त ने कोर्ट को बताया कि हरदीप वास्तव में जीवित था। इसे देखते हुए हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को याचिका को निपटाने का आदेश दिया गया था।

इस बीच, गैर-जमानती वारंट के कारण याचिकाकर्ताओं ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश से अग्रिम जमानत की मांग की तो उनके आवेदन को खारिज कर दिया गया। इस सभी से तंग आकर याचिकाकर्ताओं हाई कोर्ट से राहत देने की मांग की। इस पर हाई कोर्ट ने समन आदेश रद करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने में विफल रहा है। कोर्ट ने कहा कि हरदीप के पिता नागेंदर व अन्य ने झूठे बयानों व फर्जी तरीके से अभियुक्त बनाने की साजिश रची। कोर्ट ने नागेंदर को दो लाख व अन्य फर्जी गवाह को पचास हजार रुपये जुर्माना लगाने का भी आदेश दिया है।

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