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पराली से बिजली बनाने की संभावना...PGI और PU के शोध पर अमल से किसानों को मिलेगा बेहतर विकल्प

Published: Sun, 25 Oct 2026 07:05 AM (IST)

पीजीआई और पीयू के शोध के अनुसार, भारत में 24 प्रतिशत कृषि अवशेष जलाए जाते हैं, जिससे वायु प्रदूषण बढ़ता ...और पढ़ें

खेतों में पराली जलाकर प्रदूषण न बढ़ाएं, बिजली पैदा करने के विकल्प पर अमल करें। (एआई जनरेटेड फोटो)

खेतों में पराली जलाकर प्रदूषण न बढ़ाएं, बिजली पैदा करने के विकल्प पर अमल करें। (एआई जनरेटेड फोटो)

HighLights

  1. देश में 24 प्रतिशत कृषि अवशेष खेतों में जलाए जाते हैं।

  2. पराली जलाने से 8.23 लाख टन PM 2.5 उत्सर्जित होता है।

  3. जलाई गई पराली से 120.6 टेरावाॅट ऑवर बिजली संभव।


मोहित पांडेय, चंडीगढ़। खेतों में पराली जलाने से हर साल लाखों टन वायु प्रदूषक और 211 मिलियन टन कार्बन डाईऑक्साइड के बराबर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है। इससे हवा की गुणवत्ता प्रभावित होने के साथ जलवायु और लोगों के स्वास्थ्य पर भी खतरा बढ़ता है।

चंडीगढ़ पीजीआई और पंजाब यूनिवर्सिटी (पीयू) के शोधकर्ताओं के अध्ययन के अनुसार, देश में पैदा होने वाले कुल कृषि अवशेषों का लगभग 24 प्रतिशत खेतों में जला दिया गया। इससे 8.23 लाख टन से अधिक पीएम 2.5 कणों का उत्सर्जन हुआ। शोध में पराली से बिजली बनाने की बड़ी संभावना भी सामने आई है।

'एमिशंस ऑफ एयर पाॅल्यूटेंट्स फ्राॅम प्राइमरी क्राप रेजिड्यू बर्निंग इन इंडिया एंड देयर मिटिगेशन स्ट्रेटेजीज फाॅर क्लीनर एमिशंस' शीर्षक से यह शोध जर्नल ऑफ क्लीनर प्रोडक्शन में प्रकाशित हुआ था। इसे पीजीआई के स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ, कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के डाॅ. रविंद्र खैवाल और पीयू के पर्यावरण अध्ययन विभाग की सुमन मोर ने किया।

अध्ययन में कृषि अवशेष जलने से निकलने वाले प्रदूषकों का आकलन किया गया। शोध के अनुसार, खेतों में जलाए जाने वाले कृषि अवशेषों में धान की पराली की हिस्सेदारी लगभग 43 प्रतिशत और गेहूं के अवशेषों की 26 प्रतिशत थी।

धान की पराली से पीएम 2.5 के कुल उत्सर्जन में लगभग 51 प्रतिशत योगदान रहा। कटाई और अगली फसल की बुवाई के बीच कम समय होने से किसान खेत जल्दी खाली करने के लिए पराली जलाने का विकल्प अपनाते हैं।

2050 तक 45 प्रतिशत बढ़ सकता है प्रदूषण

अध्ययन में आशंका जताई गई कि यदि कृषि अवशेष जलाने के मौजूदा तौर-तरीके जारी रहे तो 2050 तक इससे होने वाले प्रदूषकों के उत्सर्जन में लगभग 45 प्रतिशत वृद्धि हो सकती है। पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे महीन कण सांस संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ा सकते हैं। बच्चों और अन्य संवेदनशील लोगों पर इनका असर अधिक हो सकता है।

पराली से बन सकती है 120.6 टेरावाॅट ऑवर बिजली

शोधकर्ताओं के अनुसार, खेतों में जलाए जाने वाले कृषि अवशेषों का इस्तेमाल बिजली उत्पादन में किया जाए तो लगभग 120.6 टेरावाॅट ऑवर बिजली बनाई जा सकती है। इसके अलावा पराली से बायोगैस, जैव ईंधन, बायोचार और कंपोस्ट तैयार करने की भी संभावनाएं हैं।

शोध में कहा गया है कि पराली प्रबंधन के लिए किसानों को मशीनों पर आर्थिक सहायता, आसान ऋण और पराली खरीदने की व्यवस्था उपलब्ध कराना जरूरी है। गांवों में प्रसंस्करण संयंत्र और संगठित बाजार विकसित करने से भी मदद मिल सकती है।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, केवल जुर्माने से समस्या का समाधान नहीं होगा। पराली के वैकल्पिक इस्तेमाल को किसानों के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद बनाना जरूरी है।