चंडीगढ़, [ कैलाश नाथ]। Navjot Singh Sidhu: कांग्रेस की एक 'भूल' उसे पंजाब में बहुत भारी पड़ गईंं। कांग्रेस हाईकमान की इस 'भूल' ने पंजाब में पार्टी की जड़े हिलाकर रख दी है। कांग्रेस ने नवजोत सिंह सिद्धू के फेर में कैप्‍टन अमरिंदर सिंह व सुनील जाखड़ जैसे नेताओं को गंवा दिया और अब सिद्धू भी जेल चले गए हैं। 

कांग्रेस ने सिद्धू को आगे बढ़ा कर कैप्‍टन अमरिंदर सिंह और सुनील जाखड़ को गंवाया

पार्टी आलाकमान के सिद्धू पर अति विश्‍वास के कारण कांग्रेस ने कैप्टन अमरिंदर सिंह और सुनील जाखड़ जैसे नेताओं को खो दिया तो अब नवजोत सिंह सिद्धू भी उसके लिए 'बोझ' बन गए हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा सिद्धू को एक साल की सजा सुनाए जाने के बाद भले ही प्रदेश प्रधान अमरिंदर सिंह राजा वडिंग पूर्व प्रदेश प्रधान के साथ खड़े होने का दावा कर रहे हों लेकिन उन्हीं की पार्टी के विधायक राणा गुरजीत सिंह ने सिद्धू की जुबान को एके 47 की गोलियों से भी तेज बता कर पार्टी के अंदर की राजनीति को उजागर कर दिया है।

इसके साथ ही पूर्व उपमुख्‍यमंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा ने भी वीरवार को सिद्धू को सजा सुनाए जाने के बाद उन पर जमकर तंज कसा था। इसके साथ ही सिद्धू के पटियाला में जेल जाने से पहले कुछ कांग्रेस नेता ही पहुंचे।  

हरीश रावत ने रख दी थी पंजाब में कांग्रेस के पतन की नींव

कांग्रेस के पतन की नींव 2020 में प्रदेश प्रभारी हरीश रावत की एंट्री के साथ ही रख दी गई थी। प्रदेश प्रभारी बनने के साथ ही हरीश रावत ने कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार को अस्थिर करना शुरू कर दिया था। यह वह समय था जब नवजोत सिंह सिद्धू पंजाब कांग्रेस के राजनीतिक हाशिये पर चल रहे थे।

पार्टी हाईकमान सिद्धू को अगली पंक्ति में लाने को इच्छुक था, जबकि तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह इसके लिए तैयार नहीं थे। कैप्टन लगातार पार्टी हाईकमान को यह संदेश दे रहे थे कि सिद्धू के आगे आने से पार्टी को नुकसान होगा। हरीश रावत ने पंजाब का प्रभारी बनने के साथ ही सिद्धू के साथ डिनर किया और दो दिन बाद ही बर्थडे केक भी खाया।

इसके बाद सिद्धू ने बेअदबी, बहबलकलां गोली कांड, ड्रग्स मामलों को लेकर ट्वीटर पर कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ जंग सा छेड़ दिया। यह लड़ाई इतनी बड़ी हो गई कि कई कैबिनेट मंत्रियों ने कैप्टन के नेतृत्व पर भरोसा नहीं होने की बात कहकर बगावत कर दी।

कांग्रेस हाईकमान ने भी तय पटकथा के तहत सुनील जाखड़ को प्रदेश प्रधान पद से हटाकर नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश की कमान सौंप दी। प्रदेश की कमान आने के बावजूद सिद्धू ने विपक्ष की बजाए अपनी ही पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। कांग्रेस के नेता यह कहने लगे कि अगर 2022 में कैप्टन के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाएगा तो पार्टी को हार का सामना करना पड़ेगा।

कांग्रेस हाईकमान ने भी स्थिति को संभालने की बजाए खड़गे कमेटी बनाकर विद्रोह की आग में घी डालने का काम किया। कैप्टन अमरिंदर सिंह को अंतत: अपने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। इस्तीफे के साथ ही यह तय हो गया था कि कैप्टन अमरिंदर सिंह अब कांग्रेस में नहीं रहेंगे।

मामला यहीं पर नहीं रुका। नए मुख्यमंत्री पद की तलाश में जब सुनील जाखड़ सबसे प्रबल दावेदार के रूप में सामने आए तो पार्टी ने दो जट सिखों नवजोत सिंह सिद्धू और सुखजिंदर सिंह रंधावा की ‘मैं-मै’ में खुद को  उलझाया और जट सिख व हिंदू के मुद्दे से निकल पर चरणजीत सिंह चन्नी पर दांव खेला। 2022 के चुनाव के मसले न तो चन्नी हल कर पाए और न ही सिद्धू की ईमानदार छवि और न ही पंजाब माडल चला। कांग्रेस 77 से महज 18 सीटों पर सिमट कर रह गई।

कांग्रेस न सिर्फ विधानसभा चुनाव हारी बल्कि उसके कई वरिष्ठ नेताओं ने भी पार्टी को गुड बाय कर दिया। पार्टी में उठापटक के कारण पूर्व मंत्री राणा गुरमीत सिंह सोढ़ी और फतेहजंग बाजवा ने कांग्रेस को अलविदा कहा तो  अब सुनील जाखड़ ने भी कांग्रेस को छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया है। इस तरह सिद्धू की महत्वाकांक्षाओं को हवा देकर कांग्रेस ने न सिर्फ पंजाब में सत्ता गंवाई बल्कि अपने वरिष्ठ साथियों को भी गंवा दिया। 

Edited By: Sunil Kumar Jha