चंडीगढ़, जेएनएन। जो पत्थर नदी के बहाव के साथ बहते रहते हैं वह हमेशा साफ-सुधरे रहते हैं या फिर टूटकर धरती में समा जाते हैं। उन्हें देखकर कभी भी मन दुखी नहीं होता। वहीं पर कई पत्थर ऐसे होते है जो कि पानी के बहाव आने पर किनारों पर जम जाते है और उन पर काई जमने लगती है। कुछ समय बाद उसी काई पर किसी का पैर लगता है और वह गिर जाता है। जिसे देखकर मन दुखी हो जाता है। यह शब्द मुनि विनय कुमार आलोक ने अणुव्रत भवन सेक्टर-24 में पंजाब मंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा से कहे।

उन्होंने कहा कि हमें पानी के बहाव के साथ चलने वाला पत्थर बनना चाहिए। रुकने से हम खुद की खूबसूरती को भी खत्म कर लेते हैं और उसके साथ ही हम दूसरे के दुख का भी कारण बनते हैं। आज के समय में रुकने से एक बड़ी परेशानी डिप्रेशन की भी आ रही है। हम किसी एक बात को सोचते रहते हैं और इतना सोचते हैं कि वह हमें समय से पहले ही अंत तक ले जाती है। हर रोज आत्महत्या की खबरें आम सुनने को मिलती है। इसलिए बेहतर कल के लिए जरूरी है कि हम हमेशा आगे बढ़ने की सोचे और खुद के साथ दूसरों का भी भला करने पर विचार करें।

दुख को भी स्वीकार करने की रखनी चाहिए हिम्मत

मुनि विनय कुमार आलोक ने कहा कि हम हमेशा खुशी के बारे में सोचते हैं। खुशी की जगह जब हमें किसी दुख का सामना करना पड़ता है तो हम टूट जाते हैं। इसलिए बेहतर है कि हम इस बात को हमेशा समझकर चलें कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, जिसका एक पहलू सफलता का होता है ताे दूसरा असफलता का। जब भी कोई सफर शुरू करें तो दोनों पक्षों को पहले स्वीकार कर चलें ताकि जीवन कभी बोझ न बने।

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