दयानंद शर्मा, चंडीगढ़। विवाह का मतलब यह नहीं है कि दोनों पक्ष एक साथ रहने का अभ्यास करें, अपितु विवाह दो पक्षों के बीच का बंधन है। एक वैवाहिक विवाद में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट की जस्टिस रितु बाहरी व जस्टिस अशोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने यह टिप्पणी एक दंपती के तलाक को मंजूरी देते हुए की।

इस मामले में दंपती की आपस में कभी नहीं बनी। पति व पत्नी दोनों अलग-अलग रह रहे। पत्नी आर्थिक रूप से मजबूत व सुरक्षित होने के बावजूद विवाद को सौहार्दपूर्ण ढंग से निपटाने के लिए तैयार नहीं थी। दंपती की शादी वर्ष 2011 में हुई थी। उनकी कोई संतान नहीं है।

पति के अनुसार विवाह के प्रारंभ से ही पत्नी का व्यवहार व आचरण उसके और उसके परिवार के सदस्यों के प्रति अच्छा नहीं था। शादी के कुछ दिन के बाद पत्नी ने कहा कि उसकी जबरन शादी की गई थी और वह उसकी पसंद का नहीं था। वह छोटी-छोटी बातों पर लड़ाई-झगड़ा और गाली-गलौज भी करती थी।

पति का आरोप था कि पत्नी ने उसको धमकी भी दी कि वह उसे और उसके परिवार के सदस्यों को झूठे और गंभीर आपराधिक मामले में फंसाएगी। पत्नी ने वर्ष 2012 में ससुराल छोड़ दिया था और तबसे दोनों अलग रह रहे थे। हालांकि, पत्नी ने पति के आरोपों को झूठा बताया था।

अक्टूबर, 2016 में अमृतसर की पारिवारिक अदालत ने तलाक के लिए पति की याचिका को विवाहित जीवन की सामान्य घटना बताते हुए खारिज कर दिया। इस पर पति ने तलाक के लिए पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच विवाद को सौहार्दपूर्ण ढंग से निपटाने के कई प्रयास किए, लेकिन सब व्यर्थ रहा।

दोनों पक्षों की बात सुनने और रिकार्ड की जांच करने के बाद बेंच ने कहा कि दोनों पक्षों के बीच विवाह टूट गया है और उनके एक साथ आने या फिर से एक साथ रहने की कोई संभावना नहीं है। इस मामले में तलाक न देना दोनों पक्षों के लिए विनाशकारी होगा।

पति की तलाक की मांग को स्वीकार करते हुए हाई कोर्ट ने अमृतसर की अदालत के तलाक न देने के आदेश को खारिज कर दिया व तलाक का आदेश जारी किया। हालांकि, कोर्ट ने पति को पत्नी के पक्ष में छह लाख रुपये की एफडी कराने का भी निर्देश दिया।

Edited By: Kamlesh Bhatt