जेएनएन, चंडीगढ़। पंजाब का प्रमुख त्योहार लोहड़ी राज्यभर में धूमधाम से मनाया जा रहा है। लोग सुबह से ही एक-दूसरे को लोहड़ी की शुभकामनाएं व गुड़, तिल, मूंगफली देकर खुशियां बांट रहे हैं। लोहड़ी का मुख्य कार्यक्रम वैसे तो शाम को अग्नि प्रज्ज्वलन के साथ हुआ, लेकिन सुबह से ही लोग एक-दूसरे को मुबारकबाद देने में जुटे रहे। लोहड़ी को लेकर सरकारी व गैर सरकारी संस्थानों में भी कार्यक्रम आयोजित किए गए। लोगों ने भंगड़ा डालकर पर्व मनाया।  लोहड़ी के दिन आग में तिल, गजक, मूंगफली, गुड़, रेवड़ी, खील, मक्का चढ़ाया जाता है और फिर इसे प्रसाद के रूप में लिया जाता है।

लोहड़ी नवविवाहितों के लिए खास मानी जाती है। नवविवाहित जोड़ा इस दिन अग्नि में आहुति देते हुए उसके चारों ओर घूमता है और अपनी सुखी वैवाहिक जीवन की प्रार्थना करता है। लोग नई दुल्हन के लिए तोहफे ले जाते हैं और उसके अच्छे दांपत्य जीवन की कामना करते हैं।

मोहाली स्थित ज्ञान ज्योति स्कूल में लोहड़ी मनाते स्टूडेंट्स व टीचर।

पंजाब में लोहड़ी को दुल्ला भट्टी की एक कहानी से भी जोड़ा जाता है। दुल्ला भट्टी मुग़ल शासक अकबर के समय में पंजाब में रहता था। उसे पंजाब के नायक की उपाधि से सम्मानित किया गया था। उस समय संदल बार के जगह पर लड़कियों को गुलामी के लिए बलपूर्वक अमीर लोगों को बेच जाता था जिसे दुल्ला भट्टी ने एक योजना के तहत लड़कियों को न की मुक्त ही करवाया, बल्कि उनकी शादी हिंदू लड़कों से करवाई और उनकी शादी के सभी व्यवस्था भी करवाई।

दुल्ला भट्टी की लोक कथा

सरकारी डिग्री कालेज के प्रिंसिपल प्रोफेसर असद सलीम शेख बताते हैं कि पंजाबी लोककथा के अनुसार पिंडी भट्टियां के नजदीकी गांव कोट नक्के के दुकानदार मूल चंद की एक पुत्री मुंदरी थी। (उल्लेखनीय है कि कुछ किस्सेकारों ने मूल चंद की दो पुत्रियां सुंदरी तथा मुंदरी भी लिखीं हैं, जबकि मुंदरी की सुंदरता के कारण उसे ‘सुंदर मुंदरी’ कहा गया है।) गांव का अधेड़ उम्र मुसलमान नंबरदार मुंदरी के सौंदर्य पर मुग्घ होकर उससे शादी करना चाहता था। उसने जब मूल चंद पर शादी का दिन नीयत करने के लिए दबाव डाला, तो वह रात के अंधेरे में अपनी बेटी को लेकर पिंडी भट्टियां (मौजूदा पाकिस्तान के जिला हाफिज़ाबाद का एक गांव) पहुंच गया।

मोहाली स्थित ज्ञान ज्योति स्कूल में लोहड़ी मनातीं टीचर्स।

दुल्ले ने पास के क्षेत्र सांगला हिल के अपने हिंदू मित्र साहूकार सुंदर दास के बेटे से उसका रिश्ता पक्का करके मूल चंद को कहा कि शादी वाले दिन वह नंबरदार को भी बारात लाने के लिए बोल दे। जब नियत दिन को नंबरदार बारात लेकर पहुंचा तो उसके साथियों के सामने ही दुल्ले ने उसकी खूब पिटाई की और खुद मुंदरी के पिता की भूमिका निभाते हुए उसका कन्यादान किया। इस घटना के बाद दुल्ला भट्टी की बहादुरी का यह प्रसंग लोहड़ी पर्व का हिस्सा बनकर लोक गीत के रूप में सदा के लिए अमर हो गया।

इसलिए बना वह बागी

वीर नायक दुल्ला भट्टी का जन्म मौजूदा पाकिस्तानी पंजाब के जिला हाफिज़ाबाद के बद्दर क्षेत्र के गांव चुचक में सन् 1547 में मां बीबी लद्दी व राजपूत फरीद भट्टी के घर में हुआ। हमायूं ने लगान न देने के जुर्म में फरीद खान तथा उसके पिता बिजली खान उर्फ सांदल भट्टी के सिर धड़ों से अलग कर उनकी लाशें लाहौर शाही किले के पिछले दरवाजे पर लटकवा दी थीं।

दुल्ला भट्टी बड़ा हुआ तो गांव की एक मरासन से उसे उक्त जानकारी मिली। यह सब सुनने के बाद उसने अपनी बार (जंगल का इलाका) के लड़कों की एक फौज तैयार की और मुगल दरबार के मनसबदारों और साहूकारों से धन, घोड़े और हथियार लूट कर बादशाह अकबर के विरुद्ध बगावत का एलान कर दिया। उसी दौरान दुल्ला एक परोपकारी राजा के रूप में अपने क्षेत्र की जनता के बीच लोकप्रिय हुआ।

आगाज कला केंद्र स्कूल ऑफ़ म्यूज़िक मोहाली में लोहड़ी मनाते प्रबंधक।

एक प्रसंग, जिसे रिसर्च ने झुठलाया

प्रोफेसर असद के अनुसार कई किस्साकारों ने लिखा है कि अकबर के पुत्र शेखू यानी जहांगीर का जन्म हुआ तो उसे बलवान और न्यायपसंद बादशाह बनाने के लिए दरबार के विद्वानों ने बादशाह को सुझाया कि शेखू को ऐसी राजपूत औरत का दूध पिलाया जाए जिसने शहजादे के जन्म वाले दिन ही बच्चे को जन्म दिया हो। माई लद्दी को इसके लिए चुना गया। बादशाह के हुक्म के कारण उसने अपने बेटे दुल्ले के साथ-साथ शेखू को भी अपना दूध पिलाकर बड़ा किया।

किस्सेदारों ने दुल्ला भट्टी के साथ यह उक्त तथ्य जोड़कर बहुत बड़ी भूल की है। उन्हें पहले यह जान लेना चाहिए था कि शेखू को जन्म देने वाली उसकी मां हरखा बाई, जिसे कुछ लेखकों ने गलती से हीरा कुमारी या जोधा बाई लिखा है, खुद एक राजपूतानी थी, जिसे शादी के बाद मरियम ज़मानी नाम दिया गया। शेखू का जन्म 20 सितंबर 1569 को हुआ था, जबकि दुल्ला भट्टी का 1547 में। दोनों में 22 वर्ष का अन्तर था। वहीं माई लद्दी जैसी राजपूतानी अपने पति व ससुर के हत्यारे के वंशज को अपना दूध भला क्यों पिलाती?

यूं हुआ दुल्ले का अंत

बादशाह अकबर ने दुल्ले के बागियाना स्वभाव के कारण फौज के कमांडर निज़ामूदीन को हथियारों से लैस 12 हजार सिपाहियों के साथ उसे गिरफ्तार करके लाहौर लाने के लिए भेजा। लाहौर से 27 किलोमीटर दूर गांव ठिकरीवाला के पास शाही फौज और दुल्ले की फौज में हुए युद्ध के अंत में एक साजिश रचकर दुल्ले को जिंदा गिरफ्तार कर लिया गया। दस वर्ष मुगल फौज को नाकों चने चबवाने वाले दुल्ला भट्टी को 26 मार्च 1589 की जुम्मे रात लाहौर के मुहल्ला नखास चैंक में फांसी पर लटका दिया गया। भले ही दुल्ला भट्टी तब शहीद हुआ पर पंजाबी उसकी बहादुरी की गाथा को ‘सुंदर-मुंदरिए, हो’ के रूप में हमेशा याद रखेंगे।

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