बच्चे की देखभाल के लिए 8 सप्ताह की पैरोल, उम्रकैद की सजा भुगत रहे कैदी को राहत; हाईकोर्ट ने मानवीय पहलू समझा
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने गंभीर बीमारी से पीड़ित बेटे की देखभाल के लिए एक उम्रकैदी को आठ सप्ताह की पैरोल दी ...और पढ़ें

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का आदेश। (सांकेतिक फोटो)
HighLights
लुधियाना निवासी को बेटे की देखभाल के लिए पैरोल।
कैदी का बेटा गंभीर आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित।
जिला मजिस्ट्रेट का पैरोल रद का आदेश खारिज।
राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने गंभीर आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित बेटे की देखभाल के लिए उम्रकैद की सजा काट रहे लुधियाना निवासी एक व्यक्ति को आठ सप्ताह की पैरोल देने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि कैद के दौरान भी मानवीय पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
पैरोल के आवेदन पर निर्णय लेते समय दोषी के अपराध की प्रकृति के साथ उसके परिवार की वास्तविक परिस्थितियों और बच्चे की चिकित्सा संबंधी जरूरतों पर भी विचार करना जरूरी है। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कैदी को पैरोल देने से इनकार करने का आधार केवल आशंकाएं नहीं हो सकतीं।
प्रशासन को उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों का निष्पक्ष आकलन करना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे की बीमारी और उसकी देखभाल की जरूरतों पर विचार किए बिना पैरोल का आवेदन खारिज करना उचित नहीं है। मामले के अनुसार, उम्रकैद की सजा काट रहे याचिकाकर्ता का बेटा ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी नामक गंभीर आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित है।
यह बीमारी समय के साथ बढ़ती जाती है और इससे मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं। चिकित्सकीय प्रमाणपत्र के अनुसार, बच्चे में 50 प्रतिशत दिव्यांगता है। उसकी स्थिति को देखते हुए लगातार देखभाल और माता-पिता की भागीदारी जरूरी बताई गई।
पिता ने बेटे की देखभाल के लिए पैरोल मांगी थी, लेकिन जिला मजिस्ट्रेट ने 21 मई को उसका आवेदन खारिज कर दिया था। इसके बाद उसने हाईकोर्ट का रुख किया। अदालत ने पाया कि प्रशासनिक आदेश में बच्चे की बीमारी, उसकी देखभाल की जरूरतों और परिवार की परिस्थितियों का पर्याप्त आकलन नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि अस्पताल में भर्ती होने मात्र से मरीज की देखभाल की सभी जरूरतें पूरी नहीं हो जातीं। कई सरकारी अस्पतालों में मरीजों को परिजनों के सहयोग की आवश्यकता होती है।
ऐसे में यह मान लेना उचित नहीं कि बच्चे को अस्पताल में भर्ती कराने के बाद परिवार के सदस्य की सहायता की जरूरत नहीं रहेगी। अदालत ने यह भी कहा कि प्रशासन ने इस बात का पर्याप्त आकलन नहीं किया कि बच्चे की देखभाल के लिए परिवार में कोई अन्य सदस्य उपलब्ध है या नहीं।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट का आदेश रद करते हुए उम्रकैदी को आठ सप्ताह की पैरोल प्रदान की। अदालत ने जोर दिया कि ऐसे मामलों में निर्णय लेते समय मानवीय दृष्टिकोण और उपलब्ध चिकित्सकीय साक्ष्यों को उचित महत्व दिया जाना चाहिए।
