विजय गुप्ता। Kisan Andolan राजनीति दोधारी तलवार है, दूसरे के बजाय वह भी छिल सकता है जिसने इसे हाथ में थाम रखा हो। ऐसा कृषि कानून विरोधी आंदोलन और उसके मौजूदा व भूतपूर्व पैरोकारों की ताजा स्थिति से साफ हो रहा है। ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि किसी आंदोलनकारी वर्ग ने राजनीतिक दलों को फरमान जारी कर दिया हो कि वे चुनावी रैलियां न करें, नहीं तो उनका विरोध होगा। कृषि सुधार कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे किसान संगठनों ने पंजाब में ऐसा करके राजनीतिक दलों की तो नींद उड़ा ही दी है, यह भी स्पष्ट हो गया है कि उन्हें आंदोलन फीका पड़ने का अहसास हो गया है।

विरोध के नाम पर अराजकता पंजाब ही नहीं, दिल्ली समेत पूरा देश देखता आ रहा है और अब किसान संगठन आंदोलन जिंदा रखने के लिए कहीं न कहीं निरंकुशता की ओर बढ़ रहे हैं। राजनीतिक दलों के लिए ‘चुनाव संहिता’ जारी कर रहे हैं। उनकी दलील है कि किसान राजनीतिक दलों की रैलियों में जाने लगे तो उनके धरनों में भीड़ कम हो जाएगी। खेत में काम करने वाला आम किसान इस आंदोलन में अब कितना है या नहीं है, यह कहने की बात नहीं है। आंदोलन को ढलान पर देख संगठनों को भीड़ इकट्ठा करने के लिए इस तरह के एलान करने पड़ रहे हैं कि नेता रैलियां या कार्यक्रम न करें। लोकतंत्र के लिए यह अच्छी बात नहीं कि बाकियों के लिए जनसंपर्क तक पर कथित तौर पर रोक लगा दी जाए और खुद रास्ता रोकें, संस्थान बंद करवाएं, रेल ट्रैक पर जमे रहें।

अब जबकि पंजाब में विधानसभा चुनाव में छह माह से भी कम बचे हैं, लगभग सभी दलों ने गतिविधियां तेज कर दी हैं। किसान संगठनों ने पहले केवल भाजपा नेताओं का ही विरोध करने का एलान किया था। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अश्वनी शर्मा से लेकर पार्टी के अन्य पदाधिकारियों व विधायकों के साथ मारपीट व उनके वाहनों को क्षति पहुंचाने तक की घटनाएं हुईं। उनके वीडियो भी इंटरनेट मीडिया पर वायरल हुए। यह सरकार की हीलाहवाली ही थी कि इतना सब होने के बावजूद काफी जद्दोजहद के बाद खानापूíत के लिए कार्रवाई हुई।

विरोध के नाम पर हिंसा और कार्रवाई के नाम पर केवल ‘अज्ञात’ पर केस होते देख भाजपाइयों के हौसले निश्चित रूप से पस्त हुए हैं। भाजपा के तो अनेक नेताओं ने फील्ड में उतरने से तौबा कर ली है, लेकिन विरोध की इस जद में केवल भाजपाई ही नहीं रहे, धीरे-धीरे अन्य दलों तक भी उस आग की लपटें पहुंच चुकी हैं जिसकी चिंगारी को कभी उन्होंने ही हवा दी थी। अब स्थिति अकाली दल के नेताओं के लिए भी वैसी ही हो गई है। अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर बादल को तो अपना सौ दिन का जनसंपर्क कार्यक्रम तक रद करना पड़ा है। किसानों व पंथ की राजनीति करते आए अकाली दल ने केंद्र सरकार व राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से किनारा करके शायद यह सोचा था कि इससे किसान संगठन उसके प्रति नरम हो जाएंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। भाजपा के बाद सबसे ज्यादा विरोध अकाली दल का ही हो रहा है। इसे कांग्रेस की शह पर हो रहा विरोध करार देकर वह किसान संगठनों की मंशा पर ही सवाल खड़ा कर रहा है।

अब सियासी दलों की समझ में नहीं आ रहा कि वे करें तो क्या? वे खुद एक दलदल में फंस गए लगते हैं। राजनीतिक दलों की यह बात सही है कि जनता के बीच जाना उनका लोकतांत्रिक अधिकार है, जिसे छीना नहीं जा सकता, पर अफसोस की बात यही है कि इस अधिकार के प्रयोग से पहले उन्हें किसान संगठनों के दरबार में हाजिर होना पड़ रहा है। आज अगर पंजाब में राजनीतिक दल किसान संगठनों के आगे गिड़गिड़ाने जैसी स्थिति में हैं तो इसके कारण हैं। इसके लिए ये राजनीतिक दल ही जिम्मेदार हैं।

यह किसी से छिपा नहीं है कि कांग्रेस व राज्य सरकार शुरू से ही किसान संगठनों के आंदोलन को भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के खिलाफ हवा देती रही है। अब मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह उनसे पंजाब के बजाय हरियाणा व दिल्ली बार्डर पर धरना देने की अपील यह दलील देकर कर रहे हैं कि यहां धरने-प्रदर्शनों से राज्य की आíथक स्थिति प्रभावित हो रही है। क्या इससे राज्य का माहौल और खराब नहीं होगा? केवल अपने आंदोलन को जिंदा रखने के लिए किसान संगठन अगर ऐसा कर रहे हैं और राजनीतिक दल पंगु नजर आ रहे हैं तो यह उनके लिए चुनौती भी है और सबक भी।

[वरिष्ठ समाचार संपादक, पंजाब]

Edited By: Sanjay Pokhriyal