यशपाल चौहान, डेराबस्सी

इंसान की जिंदगी में कभी न भूलने वाली सच्चाई हमेशा हमसाया बनकर रहती है। कश्मीर से बेहद कठिन हालातों में विस्थापित हुए कश्मीरी पंडितों के परिवारों के लोगों के लिए वह दौर कभी न भूलने वाला कड़वा सच है। 30 साल पहले यहां आकर बसे कश्मीरी पंडितों में शामिल भारत भूषण हांडू उर्फ दिलबर भारत का कहना है कि वे बीते तीस वर्षो से अपने ही मुल्क में शरणार्थी जीवन जी रहे हैं।

उनका कहना है कि कश्मीरी पंडितों की समूची कौम अपनी जमीन पर वापस जाने के लिए बेकरार तो हैं, लेकिन उन दिनों को याद कर वह आज भी घबरा उठते हैं, जब पिछले तीस साल पहले उन्हें अपनी जान बचा कर भागने को विवश होना पड़ा था।

सैकड़ों कश्मीरी परिवार बरसों पहले कश्मीर से पलायन कर चंडीगढ़, पंचकूला में आकर बस गए। कुछ परिवार डेराबस्सी में भी पिछले कई वर्षो से रह रहे हैं। पंडित भारत भूषण हांडू ने बताया कि वह आज जब भी उन पलों को याद करते हैं तो रूह कांप जाती है।

दिलबर भारत को आज भी वह मंजर याद है। बताते हैं कि 19 जनवरी को मस्जिदों में से लाउड स्पीकर से आवाजें आनी शुरू हो गई थीं।.. बीवियां और बेटियां यहां छोड़ कर भाग जाओ! उपद्रवियों ने उनके घरों पर पथराव करना शुरू कर दिया था। हमारे परिवार में 26 लोग थे। वे छह भाई थे। उनका घर छह कमरों का था और एक नया घर भी बनवाया था। शिवरात्रि पर हमें नए मकान में जाना था, लेकिन उससे पहले ही उपद्रवियों ने कश्मीरी पंडितों के घर के बाहर पोस्टर चिपका कर धमकाना शुरू कर दिया। ऐसे ही एक दिन मेरे घर के बाहर पोस्टर चिपका दियागया। उस पर लिखा था कि आज दिलबर भारत की बारी है। उस अलगाववादी की मां ने आकर बताया कि दिलबर को कुछ लोग मारना चाहते हैं। वह घर से भाग जाए। दिलबर ने बताया कि उसी रात घर पर पत्थर फेंके गए। चुन चुन कर लोगों को जान से मारा जाने लगा। किसी तरह भाग कर वह कश्मीर से जम्मू आ गए। जेब में केवल पंद्रह सौ रुपये ही थे। उस दिन के बाद से ही उनका परिवार शरणार्थी बन गया। साल 2016 में पर्यटक बन कर जाना पड़ा कश्मीर

दिलबर ने बताया कि साल 2016 में उन्हें कश्मीर जाने का मौका मिला। कश्मीर में पर्यटकों के लिए कोई मुश्किल नहीं है। दिलबर अपनी बेटी के साथ पर्यटक बन कर गए थे। उन्होंने कहा कि कश्मीरी पंडितों के लिए हालात आज भी ठीक नहीं हैं। खीर भवानी मंदिर जाकर माथा टेका और खूब रोए। ज्येष्ठ अष्टमी को यहाँ मेला लगता है, पुरानी यादें ताजा हो गई। दिलबर का घर हब्बा कदल में था, मगर वहां जा नहीं पाए। क्योंकि उस दिन शुक्रवार था। इस दिन जुमे की नवाज के कारण सभी रस्ते बंद हो जाते हैं। ऐसे में उन्हें वहीं से वापस आना पड़ा। अब कश्मीर में कई जगहों के नाम तक बदल गए :

दिलबर ने बताया कि दु:ख की बात यह है की वहां कई जगहों के नाम बदल दिए गए। जैसे अनंतनाग को इस्लामाबाद, शंकराचार्य को सुलेमान, हरिपर्वत को कोहिमारा नाम रख दिया गया। मंदिर तो वही हैं,लेकिन उनके साथ लगने वाली जगह पर कब्•ा कर के रिहायशी कॉलोनी बना दी गई है। ट्राईसिटी में रहते हैं कश्मीरी पंडितों के करीब 120 परिवार

दिलबर ने बताया कि कश्मीरी पंडितों के आज लगभग 120 परिवार ट्राईसिटी में रहते है, जिन्होंने कश्मीर से पलायन किया था। यह लोग समय -समय पर आपस में मिलते रहते हैं। 19 जनवरी को हर वर्ष ट्राई सिटी में विस्थापित दिवस मनाया जाता है। इस बार चंडीगढ़ सेक्टर 24 में मनाया जाएगा। उनका मानना है कि अब तो सरकारों ने भी उनका हालचाल पूछना बंद कर दिया है। यह उनके लिए दुखद है। वे अपने ही देश के उन बुद्धिजीविओं से नाराज हैं, जो कश्मीरी पंडितों की दुर्दशा पर अपने अवॉर्ड नहीं लौटाते।

Posted By: Jagran

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