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जसवंत खालड़ा हत्याकांड: दोषी पुलिस अधिकारियों के वीरता पदक बरकरार, गृह मंत्रालय के वापस लेने के दिए थे निर्देश

Published: Sat, 11 Jul 2026 04:50 PM (IST)

खालड़ा हत्याकांड में दोषी करार दिए गए दो पुलिस अधिकारियों के वीरता पदक अब भी बरकरार हैं, जबकि केंद्रीय गृह ...और पढ़ें

जसवंत सिंह खालड़ा। फाइल फोटो

जसवंत सिंह खालड़ा। फाइल फोटो

HighLights

  1. खालड़ा हत्याकांड के दोषी पुलिस अधिकारियों के पदक बरकरार।

  2. गृह मंत्रालय ने पदक वापसी के लिए निर्देश दिए थे।

  3. राज्य सरकार की संस्तुति न मिलने से प्रक्रिया रुकी।

रोहित कुमार, चंडीगढ़। पंजाब के बहुचर्चित मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा हत्याकांड में दोषी करार दिए जा चुके दो पुलिस अधिकारियों से वीरता पदक वापस नहीं लिए जाने का मामला एक बार फिर चर्चा में है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय (एमएचए) ने वर्षों पहले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को स्पष्ट निर्देश जारी किए थे कि जिन पुलिस अधिकारियों का आचरण पुलिस बल की प्रतिष्ठा को धूमिल करता है या जिन्हें गंभीर आपराधिक मामलों में दोषी ठहराया गया है, उनके वीरता पदक वापस लेने की सिफारिश की जाए।

इसके बावजूद पंजाब के इस चर्चित मामले में अब तक कोई अंतिम कार्रवाई नहीं हो सकी है। मामला पूर्व इंस्पेक्टर सुरजीत सिंह और पूर्व हेड कांस्टेबल जसपाल सिंह का है। दोनों अधिकारियों को पुलिस सेवा के दौरान राष्ट्रपति पुलिस पदक (वीरता) से सम्मानित किया गया था।

बाद में सीबीआई की जांच और लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद दोनों को जसवंत सिंह खालड़ा के अपहरण, अवैध हिरासत, हत्या तथा सबूत नष्ट करने के मामले में दोषी ठहराया गया। दोषसिद्धि के बावजूद दोनों के वीरता पदक अब तक बरकरार हैं।

केंद्र सरकार को भेज सकती है संस्तुति

दरअसल, गृह मंत्रालय ने 29 मई 2007 को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को एक विस्तृत पत्र जारी किया था। इसमें कहा गया था कि यदि किसी पदक प्राप्त अधिकारी का आचरण ऐसा पाया जाता है जिससे पुलिस बल की छवि को ठेस पहुंचती हो या वह किसी गंभीर अपराध में दोषी पाया जाए तो संबंधित राज्य सरकार उसके पदक वापस लेने की संस्तुति केंद्र सरकार को भेज सकती है।

मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि ऐसी सिफारिशों पर केंद्र स्तर पर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।जसवंत सिंह खालड़ा का मामला पंजाब के सबसे चर्चित मानवाधिकार मामलों में शामिल है। खालड़ा ने 1990 के दशक में पंजाब में कथित फर्जी मुठभेड़ों के बाद लावारिस शवों के अंतिम संस्कार से जुड़े मामलों का खुलासा किया था।

उनके खुलासों के बाद 6 सितंबर 1995 को उनका कथित रूप से अपहरण कर लिया गया। लंबे समय तक उनकी गुमशुदगी रहस्य बनी रही, जिसके बाद मामला राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आया और जांच सीबीआई को सौंपी गई।सीबीआई की जांच में कई पुलिस अधिकारियों की भूमिका सामने आई।

अदालत में चले लंबे मुकदमे के बाद पूर्व एसएसपी अजयब सिंह पूनिया, पूर्व इंस्पेक्टर सुरजीत सिंह, पूर्व सब-इंस्पेक्टर बलदेव सिंह और पूर्व हेड कांस्टेबल जसपाल सिंह सहित कई आरोपितों को विभिन्न धाराओं में दोषी ठहराया गया।

वीरता पदकों को वापस लेने की प्रक्रिया नहीं बढ़ सकी आगे  

अदालत ने अपहरण, गैरकानूनी हिरासत, हत्या और साक्ष्य मिटाने जैसे गंभीर अपराधों में सजा सुनाई थी।हालांकि दोषसिद्धि के बाद भी वीरता पदकों को वापस लेने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।

यही कारण है कि गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के बावजूद इस मामले में कार्रवाई लंबित रहने पर सवाल उठ रहे हैं। जानकारों का कहना है कि पदक वापस लेने की प्रक्रिया राज्य सरकार की संस्तुति से शुरू होती है, लेकिन इस मामले में ऐसा प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाया।

करीब तीन दशक पुराने इस मामले में दोषी अधिकारियों के वीरता पदक अब भी बरकरार रहने से प्रशासनिक जवाबदेही पर भी प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।

मानवाधिकारों से जुड़े इस चर्चित प्रकरण में अब फिर यह बहस तेज हो गई है कि गंभीर अपराधों में दोषी करार दिए जा चुके अधिकारियों को मिले सम्मान को लेकर सरकार आखिर कब निर्णय लेगी।