चंडीगढ़ [दयानंद शर्मा]। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने अपने एक आदेश में महत्वपूर्ण फैसला देते हुए साफ किया कि अगर किसी के खिलाफ संगीन आरोप या नैतिकता के पतन का मामला दर्ज नहीं है तो उसे नौकरी से बर्खास्त नहींं किया जा सकता। हाई कोर्ट की जस्टिस रितू बाहरी ने यह आदेश भिवानी निवासी कुलदीप सिंह की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए।

कुलदीप सिंह हरियाणा जेल विभाग में वार्डन के तौर पर कार्यरत थे। उन्हें 2013 में जेल वार्डन के पद पर नियुक्ति दी गई थी। 2007 में उसके गांव की ही एक परिवार के साथ कुछ विवाद के चलते उस पर वे उसके परिवार वालों पर एफआइआर दर्ज की गई थी। इस एफआइआर के चलते उसे नवंबर 2011 में जिला अदालत द्वारा एक साल छह  महीने की सजा सुनाई गई थी।

सजा के खिलाफ सेशन कोर्ट में अपील की गई थी जो खारिज हो गई। इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट  में याचिका दाखिल करते हुए सेशन कोर्ट के आदेश को चुनौती दी। हाई कोर्ट ने  सजा को निलंबित करते हुए याचिका को एडमिट कर लिया था। इसी बीच, दिसंबर 2014 को जेल विभाग के मुख्यालय से उसके बर्खास्तगी के आदेश जारी कर दिए गए।

जेल विभाग ने अपराधिक मामले में मिली सजा को आधार बनाते हुए उसकी सेवाओं को समाप्त करने का आदेश जारी कर दिया। हाई कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि यह दो परिवारों के बीच का मामूली विवाद था। जब याची ने नौकरी के समय जो चरित्र प्रमाण दिया उसमें साफ था कि याची का चरित्र अच्छा था जिसे  स्वयं उच्च अधिकारी ने तसदीक किया था। 

कोर्ट ने कहा कि ऐसा अपराध जो नैतिकता के पतन की श्रेणी में नहीं आता हो उसके लिए किसी कर्मचारी की सेवाओं को समाप्त करने के आदेश नहीं जारी किए जा सकते हैं। हाई कोर्ट ने याची की बर्खास्तगी आदेश को रद करते हुए जेल विभाग को आदेश दिया कि वो एक महीने के भीतर उसे दोबारा नौकरी पर ज्वाइन करवाए।

 

Edited By: Kamlesh Bhatt

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