गिरफ्तारी का लिखित आधार न बताना ईडी को पड़ा महंगा, हाईकोर्ट ने 8 आरोपितों की जमानत रखी बरकरार
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने धनशोधन मामले में 8 आरोपितों की जमानत रद करने की ईडी की याचिका खारिज कर ...और पढ़ें

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में सुनवाई। (सांकेतिक फोटो)
HighLights
ईडी की 8 आरोपितों की जमानत रद करने की याचिका खारिज।
गिरफ्तारी के कारण बताने की बाध्यता कानून में पहले से थी।
सुप्रीम कोर्ट ने केवल लिखित जानकारी देने का तरीका स्पष्ट किया।
राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट से झटका लगा है। धनशोधन के मामलों में जमानत पर बाहर चल रहे आठ आरोपितों की जमानत रद कराने की ईडी की मांग अदालत ने खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार बताने की बाध्यता कानून में पहले से थी।
सुप्रीम कोर्ट ने बाद में यह स्पष्ट किया कि इन आधारों की जानकारी लिखित रूप में देना आवश्यक है। इसलिए इस व्यवस्था को केवल तीन अक्टूबर, 2023 से लागू मानकर उससे पहले हुई गिरफ्तारियों के मामलों में जमानत को चुनौती नहीं दी जा सकती।
जस्टिस संजय वशिष्ठ की पीठ ने 28 अक्टूबर को फैसला सुनाते हुए ईडी की आठों याचिकाएं खारिज कर दीं और पंचकूला की विशेष अदालत से आरोपितों को मिली जमानत बरकरार रखी। आरोपितों की ओर से वकील सजल बंसल और दीपाशु बंसल ने दलील दी कि ईडी ने जमानत की शर्तों के उल्लंघन या राहत के दुरुपयोग का आरोप नहीं लगाया है।
जबरन वसूली और मनी लॉन्ड्रिंग का मामला
ईडी ने पंचकूला में जबरन वसूली और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आरोपित चंद्रशेखर, साहिल भल्ला, नरेश कुमार श्योकंद, अश्वनी कुमार उर्फ अश्वनी शर्मा, आकाश भल्ला, निर्मल सिंह, नरिंदर खिल्लन और अनिल भल्ला की जमानत रद कराने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था। इन सभी को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध नहीं कराए जाने के कारण राहत मिली थी।
ईडी ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट ने तीन अक्टूबर, 2023 को पंकज बंसल मामले में गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में देने की अनिवार्यता स्पष्ट की थी। लिहाजा, इससे पहले हुई गिरफ्तारियों में भी इस व्यवस्था के आधार पर दिए गए जमानत आदेशों को चुनौती दी जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि धनशोधन निवारण अधिनियम की धारा 19 के तहत गिरफ्तारी के आधार बताना पहले से अनिवार्य था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने यह दायित्व पहली बार नहीं बनाया, बल्कि लिखित जानकारी देने का तरीका स्पष्ट किया, ताकि एजेंसी जरूरत पड़ने पर अदालत में अनुपालन साबित कर सके।
समान परिस्थितियों में भेदभाव की आशंका
अदालत ने कहा कि ईडी की दलील मानने से पहले जमानत पा चुके मामलों को दोबारा खोलने और आदेशों की समीक्षा का रास्ता खुल सकता है। इससे समान परिस्थितियों वाले आरोपितों के साथ भेदभाव की आशंका है। फैसले में यह भी कहा गया कि ईडी ने किसी आरोपित पर जमानत की शर्त तोड़ने या राहत का दुरुपयोग करने का आरोप नहीं लगाया।
