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आयकर रिफंड का दावा मात्र देरी के आधार पर खारिज नहीं कर सकते, हाईकोर्ट का अहम फैसला

Published: Fri, 25 Sep 2026 08:00 PM (IST)

हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि आयकर रिफंड के दावे को केवल देरी के आधार पर खारिज ...और पढ़ें

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में हुई मामले की सुनवाई।

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में हुई मामले की सुनवाई।

HighLights

  1. दावे की वास्तविकता और आर्थिक स्थिति देखना अनिवार्य।

  2. हाईकोर्ट ने पंचकूला आयकर आयुक्त का आदेश रद किया।

  3. मामले को नए सिरे से निर्णय के लिए वापस भेजा।

राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने आयकर रिफंड के एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि निर्धारित समय के बाद दाखिल रिफंड दावे को केवल देरी के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।

संबंधित अधिकारी को आवेदन पर स्वतंत्र रूप से विचार करते हुए यह देखना होगा कि प्रस्तावित रिफंड का दावा वास्तविक और सही है या नहीं। इसके साथ ही यह भी जांचना आवश्यक है कि रिफंड से इनकार किए जाने पर आवेदक को आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ेगा या नहीं।

अदालत ने पंचकूला के प्रधान आयकर आयुक्त का आदेश रद करते हुए मामले को नए सिरे से निर्णय के लिए वापस भेज दिया। यह मामला एचएमटी की ट्रैक्टर इकाई के एक पूर्व कर्मचारी से जुड़ा है, जिसने कंपनी की खराब वित्तीय स्थिति के कारण जुलाई 2014 से वेतन नहीं मिलने की शिकायत की थी।

केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2016 में इस इकाई को बंद करने का निर्णय लिया। इसके बाद कर्मचारियों के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति और स्वैच्छिक पृथक्करण योजना लाई गई। याचिकाकर्ता ने स्वैच्छिक पृथक्करण योजना का विकल्प चुना और उसे कुल 29,14,500 रुपये मिले।

एचएमटी की ओर से जारी प्रपत्र में पांच लाख रुपये को आयकर अधिनियम की धारा 10(10सी) के तहत करमुक्त माना गया, जबकि शेष राशि पर कर लगाया गया। इसी आधार पर कर्मचारी ने 3 अगस्त 2017 को आयकर रिटर्न दाखिल किया, जिसे विभाग ने स्वीकार कर लिया।

समान मामलों में राहत मिलने के बाद किया रिफंड का दावा

बाद में, समान परिस्थितियों वाले एक अन्य कर्मचारी के मामले में सेवा समाप्ति पर मिले मुआवजे को आयकर अधिनियम की धारा 10(10बी) के तहत करमुक्त माना गया। इसके बाद आयकर अपीलीय अधिकरण ने भी इसी तरह के अन्य कर्मचारियों के मामलों में राहत दी।

इन फैसलों के आधार पर याचिकाकर्ता ने 10 अगस्त 2020 को देरी माफ करने के लिए आवेदन किया और संशोधित रिटर्न दाखिल कर करीब 7,19,819 रुपये के रिफंड का दावा करने की अनुमति मांगी। हालांकि, प्रधान आयकर आयुक्त ने जनवरी 2022 में आवेदन खारिज कर दिया। इसके खिलाफ कर्मचारी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

केवल विभाग की असहमति बताना पर्याप्त नहीं

हाईकोर्ट ने पाया कि प्रधान आयकर आयुक्त के आदेश में इस महत्वपूर्ण पहलू पर स्वतंत्र और स्पष्ट निष्कर्ष नहीं दिया गया कि याचिकाकर्ता का प्रस्तावित रिफंड दावा वास्तव में सही और वास्तविक है या नहीं। अदालत ने कहा कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि विभाग संबंधित अपीलीय फैसले से सहमत नहीं है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि देरी माफी के आवेदन पर विचार करते समय कर्मचारी की नौकरी समाप्त होने की परिस्थितियों, प्रस्तावित रिफंड की उसके लिए अहमियत और समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों को पहले मिल चुकी राहत जैसे तथ्यों पर भी विचार किया जाना चाहिए।

इन पहलुओं से यह तय करने में मदद मिल सकती है कि रिफंड न मिलने से आवेदक को वास्तविक आर्थिक परेशानी होगी या नहीं। हाईकोर्ट ने मामले को इन सभी पहलुओं पर विचार कर कानून के अनुसार नया निर्णय लेने के लिए प्रधान आयकर आयुक्त के पास भेज दिया।