चंडीगढ़, इन्द्रप्रीत सिंह। आज श्री गुरु तेग बहादुर साहिब का बलिदान दिवस है। पूरे विश्व में ऐसे किसी बलिदान की घटना नहीं है जिस प्रकार का बलिदान उन्होंने वर्ष 1675 में दिल्ली के चांदनी चौक में दिया था। समय ज्यादा नहीं बदला है। एक बार फिर से धार्मिक कट्टरता लोगों के मन में भारी होती जा रही है। खासतौर पर पंजाब में जिस प्रकार का माहौल बनता जा रहा है, उसे देखते हुए हिंदू वर्ग में ही नहीं, बल्कि सिखों में भी चिंता बढ़ती जा रही है और इस चिंता के बढ़ने का सबसे बड़ा कारण सिखों में बढ़ रही धार्मिक कट्टरता है।

गुरबाणी में रोस न कीजै उत्तर दीजै जैसे सिद्धांत को छोड़कर सोध देने (मार देने) की धमकियां देकर लोगों को डराया जा रहा है। यह तो सिखी के मूल सिद्धांत के ही खिलाफ है। अमृतपाल जैसे लोग जो सिखी पहरावे में एक तरफ लोगों को अमृतपान करने का प्रचार कर रहे हैं और दूसरी ओर दूसरे धर्मों के लोगों को डराने की कोशिश। वह सिखों को गुलाम कहकर उन्हें गुमराह कर रहे हैं और पुरानी घटनाओं की याद दिलाकर उनमें धार्मिक कट्टरता भरने की कोशिश कर रहे हैं। शायद वह गुरु तेग बहादुर साहिब के समय को भूल गए हैं। वह यह भी भूल गए हैं कि सिखों को गुलाम नहीं किया जा सकता।

यह सही है कि वर्ष 1984 और आपरेशन ब्लू स्टार की निंदनीय घटनाओं में सिखों को इंसाफ नहीं मिला। इस बात को वह याद रख सकते हैं, लेकिन इसके चलते सिख गुलाम हो गए हैं और आजादी के लिए उनका युवाओं से शहादतें देने का आह्वान किसी भी तरह जायज नहीं ठहराया जा सकता। दूसरी ओर शिव सेना के सुधीर सूरी सहित अन्य कथित नेता जो सिखों को मात्र डेढ़ प्रतिशत होने की बात कहकर मसल देने जैसे बयान दे रहे हैं, ये बयान उन्हें कभी भी हिंदुओं का नेता नहीं बनाते। ऐसे लोगों को आज ही के दिन का वर्ष 1675 का समय याद करने की आवश्यकता है। इस तरह की बयानबाजी पंजाब जैसे प्रदेश में, जहां कहीं भी धार्मिक कट्टरता की जगह नहीं है, वहां इस प्रकार का जहर फैलाया जा रहा है।

वर्ष 1675 के समय में मुगल बादशाह औरंगजेब भी इसी तरह की मजहबी कट्टरता का शिकार था। वह भी सभी को डरा-धमकाकर उन्हें मुसलमान बनाने के सोच पर चल रहा था। उसका मानना था कि अलग अलग धर्मों की वजह से ही मजहबी फसाद होते हैं। क्यों न सभी का धर्म एक ही हो जाए। अपने इस मजहबी सोच को पूरा करने के लिए आैरंगजेब ने गैर मुस्लिम लोगों को जबरन मतांतरण के लिए मजबूर किया और जिन्होंने ऐसा करना स्वीकार नहीं किया, कोई भी दलील सुने बिना उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। ऐसे में जब कश्मीरी ब्राह्मणों ने श्री आनंदपुर साहिब में गुरु तेग बहादुर साहिब के सामने जाकर यह बात रखी और कहा कि वह हमें जबरदस्ती मुसलमान बनाना चाहता है तो गुरु तेग बहादुर साहिब ने कहा कि आप उनसे जाकर कह दें कि अगर उनके गुरु को वह मुसलमान बना ले तो वे सभी मुसलमान बन जाएंगे।

गुरु साहिब को उनके सिखों सहित दिल्ली में गिरफ्तार कर लिया गया। तीन सिखों भाई मती दास, भाई सती दास और भाई दयाल जी को जिस निर्ममता के साथ बलिदान किया गया उसे देखकर भी गुरु तेग बहादुर साहिब अडिग रहे। आखिर उनका सिर भी धड़ से अलग करके शहीद कर दिया गया। यह अपने आप में एक बड़ा बलिदान था, जो धर्म की रक्षा के लिए दिया गया था। धर्म को बचाए रखने का यह सबसे बड़ा उदाहरण था, लेकिन आज पंजाब को जिस मजहबी सोच की ओर धकेला जा रहा है, वह कतई सिखी सोच नहीं है। गुरु नानक साहिब से लेकर सभी गुरुओं ने दलील की बात की है और जो दलील से सहमत नहीं है उन्हें मारने की धमकियां नहीं दी गई हैं।

गुरु नानक साहिब ने इस सिद्धांत के प्रचार के लिए 38 हजार किलोमीटर की चार दिशाओं में यात्राएं कीं। वह अनेक उन लोगों से मिले जिनके विचार से वे सहमत नहीं थे, लेकिन उन्होंने अपनी दलील और विचार के जरिये ही उनका मन बदला। गुरु तेग बहादुर साहिब ने अपना बलिदान देकर उस विचार को आगे बढ़ाया। जरूरत इस बात की है कि आज के दिन गुरु तेग बहादुर साहिब और उनके शिष्यों के बलिदान दिवस को याद करते हुए धार्मिक कट्टरता से दूर रहा जाए। पंजाब पहले भी डेढ़ दशक तक अपने हजारों युवाओं को गंवा चुका है। इस डेढ़ दशक ने एक पूरी पीढ़ी खत्म कर दी है और आज एक बार फिर पंजाब उसी मुहाने पर खड़ा है। इसलिए बेशक वह हिंदू धर्म के लोग हों या सिख, कम से कम उन्हें इस तरह उन्मादी विचारधारा से दूर रहने की आवश्यकता है। यही श्री गुरु तेग बहादुर साहिब के बलिदान दिवस से प्रेरणा होगी।

[ब्यूरो प्रमुख, पंजाब]

Edited By: Sanjay Pokhriyal

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