चंडीगढ़। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) या एनडीए के सबसे पुराने और अहम सहयोगी दल शिरोमणि अकाली दल के प्रधान सुखबीर सिंह बादल और उनकी पार्टी के लिए यह आम चुनाव केवल लोकसभा चुनाव नहीं बल्कि अपने अस्तित्व की किसी जंग से कम नहीं हैं। प्रदेश में अकाली - भाजपा सरकार के दौरान हुई बेअदबी की घटनाओं व अकाली दल में हुई बगावत के बाद की वही पहली जंग जो अगले विधानसभा चुनाव में बादल परिवार समेत एनडीए के इस घटक दल की 'दिशा और दशा' दोनों तय करेगी। इस जंग में 'अचंभित' कर देने वाले परिणाम देने का दावा करने वाले पार्टी प्रधान सुखबीर सिंह बादल आज जहां इस महासमर में स्वयं बतौर उम्मीदवार उतरे हैं वहीं उन पर आजकल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू भी सिर चढ़ कर बोल रहा है।

सिखों पर मोदी मैजिक काम नहीं करता  तो क्या हमारा गठबंधन दिल्ली के विधानसभा चुनावों में भी होता?

पूरे राज्य में घूम - घूम कर प्रचार करते हुए वह कहते हैं कि देश को मोदी जैसा प्रधानमंत्री आज तक नहीं मिला। उनके अनुसार मोदी के कार्यकाल में पंजाब , विशेषकर सिख समुदाय, को वह सब मिला जो शायद पिछली एनडीए सरकार में भी हासिल नहीं हुआ। आखिर क्या है इस मोदी मैजिक की कहानी और क्यों इतने आश्वस्त हैं वह राजग की जीत को लेकर। प्रस्तुत है इन तमाम विषयों पर बादल गांव स्थित उनके निवास स्थान पर दैनिक जागरण के पंजाब के स्थानीय संपादक अमित शर्मा से एक विशेष मुलाकत के दौरान हुई चर्चा के कुछ अंश...

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- 'फिर एक बार मोदी सरकार' ऐसा नारा आपकी हर चुनावी सभा में गूंजता है। उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में पिछले चुनाव की तुलना में इस बार सीटों का नुकसान होने की संभावना को देखते क्या वास्तव में ऐसा मुमकिन होगा?

 - यह मुख्यमंत्री या पंचायत का चुनाव नहीं है। देश के लोगों ने इस चुनाव में प्रधानमंत्री चुनना है। जनता जानती है कि देश के विकास और देश को चलाने के पीछे असली विजन प्रधानमंत्री का ही होता है। सो उसे पता है कि यदि मजबूत प्रधानमंत्री होगा तो वह देश को नई दिशा देगा लेकिन अगर कमजोर हुआ तो देश का बंटाधार होना तय। मजबूत प्रधानमंत्री की बात हो तो देश के पास एक ही विकल्प है और वह हैं नरेंद्र मोदी। रही बात उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में भाजपा की परफॉरमेंस की तो सबको पता है कि राजनीति में नफा और नुकसान तो होता ही रहता है। कहीं सीटों में वृद्धि होती है तो कहीं सीटें पहले से कम मिलती हैं। जो यहां हाथ से जाना है उसे दूसरे रूप में पंजाब, बंगाल, ओडिशा और बिहार जैसे राज्यों से एनडीए के खाते में आना है। पंजाब ही ले लो ,पिछली बार छह सीटें थीं इस बार दोगुनी होंगी। शिअद-भाजपा गठबंधन इस बार नौ से 11 सीटें हासिल कर सभी को अचंभित करेगा। दूसरी तरफ छोटे-छोटे दलों को मिलाकर बना गठबंधन सौ की संख्या भी पार नहीं कर पाएगा और कांग्रेस तो 60-70 सीटों पर ही अटक जाएगी।

- जीत को लेकर इतना आश्वस्त होने की वजह? कमजोर विपक्ष का नेतृत्वहीन होना या नरेंद्र मोदी का पार्टी से भी बड़ा चेहरा (लार्जर देन पार्टी) बन कर उभरना?

 - इतने चुनाव लड़ और लड़वा कर इतना ही समझा हूं कि चेहरों की पेशकारी से न तो कभी चुनावी तकदीरें बदली हैं और न ही कभी बदलेंगी... अंत में जनता फैसला तो आपकी ( मुख्यमंत्री हो या प्रधानमंत्री या फिर शहर का मेयर ) पांच साल की कारगुजारी पर ही करती है। नरेंद्र मोदी ने कई कड़़े फैसले लेकर भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में अपने आपको अब तक का सबसे सशक्त और निर्णायक फैसले लेने वाला प्रधानमंत्री साबित किया है। चाहे बात नोटबंदी की हो या फिर जीएसटी, सर्जिकल स्ट्राइक या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अन्य देशों पर भारत के बढ़ते प्रभाव की- इन सभी मामलों में कड़े फैसले लेकर मोदी ने चुनावी रण में एक ऐसे सेनापति की छवि को पेश किया है, जो विपक्ष के किसी भी नुमाइंदे में दूर-दूर तक ढूंढ़े भी नहीं मिलती। इसी कारण एनडीए से जुड़ा हर व्यक्ति जीत को लेकर आश्वस्त ही नहीं दिल से प्रयासरत भी है।

-ऐसा लगता है कि शिरोमणि अकाली दल की लीडरशिप पर इस बार 'मोदी मैजिक' सिर चढ़ कर बोल रहा है? इसकी वजह कहीं आपकी पार्टी का पिछले विधानसभा में तीसरे नंबर की पार्टी बनकर रह जाना, फिर बेअदबी की घटना को लेकर चौतरफा घिरना और अकाली दल के टूटने पर पार्टी कैडर में और पंजाब की जनता में पैठ का कमजोर होना तो नहीं?

- यह तो आपका अपना आकलन है... मैं इसे नहीं मानता। न तो अकाली दल कमजोर हुआ है और न बीजेपी से रिश्ते में कोई में बदलाव आया है। 1996 में जैसा यह रिश्ता था वैसा ही आज है। पंजाब में शिरोमणि अकाली दल हमेशा भारतीय जनता पार्टी का बड़ा भाई बन कर रहा है। जब यह गठबंधन बना था तो किसी राजनीतिक मंतव्य से नहीं बना था। यह उस समय की जरूरत थी और आज की भी है। पूरे विश्व में हिंदू-सिख एकता का अगर कोई जीवंत उदाहरण है तो वह है पंजाब में शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी का रिश्ता। सरदार प्रकाश सिंह बादल तो यहां तक कहते हैं कि यह रिश्ता नाखून और मांस का ऐसा रिश्ता है जो देह जल जाने के बाद भी हमेशा हमेशा कायम रहेगा। अब इस रिश्ते को मीडिया अपनी नजर में मोदीमय कहें या फिर गठबंधन धर्म का निर्वहन.. कोई फर्क नहीं पड़ता। सच्चाई यह है कि जैसे पंजाब में सामाजिक दृष्टि से हिंदू और सिख परिवार एक दूसरे के पूरक हैं ठीक उसी तरह हर मायनों में भाजपा और अकाली दल एक दूसरे के पूरक हैं।

- लेकिन 1996 से लेकर आज तक पहली बार ऐसा हुआ है कि चुनाव रैलियों में शिरोमणि अकाली दल की स्टेज से 'सत श्री अकाल' के साथ साथ अब अकाली नेता ही 'जय श्री राम' का नारा भी लगाने लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषक तो इसे अकाली दल पर भाजपा की बढ़ती पकड़ मानते हैं। आपकी राय?

- (ताली ठोक जोर से हंसते हुए).... इसे ही तो सदभावना कहेंगे। मैंने तो पहले ही कहा कि हिंदू - सिख एकता की अगर कोई मिसाल देखने को मिलेगी तो भाजपा और अकाली दल के गठबंधन में ही दिखेगी। जहां तक सत श्री अकाल के साथ जय श्री राम के नारे की बात है तो इसमें गलत ही क्या है? अगर भाजपा के मंच पर जो बोले सो निहाल या सत श्री अकाल बोला जा सकता है तो अकाली दल की स्टेज पर क्यों नहीं? जब ऐसा न हो तो मीडिया में आप लोग इन्हीं राजनीतिक विश्लेषकों का हवाला  देते हो कि यह गठबंधन मात्र चुनावी औपचारिकता है। दोनों पार्टी के नेता एक दूसरे में बहुत रचे बसे नहीं है। अब अगर ऐसा दिखने लगा है तो आप उसे पार्टियों की एक दूसरे पर घटती बढ़ती पकड़ बता कर पेश कर रहे हैं। यह सब तो उस साझ को दर्शाता है जिसके चलते हम पंजाब में ऐसे नतीजे देंगे की सब हैरान रह जाएंगे।

 -यह आम राय है कि पंजाब में सिख समुदाय पर मोदी मैजिक ज्यादा नहीं चलता? 2014 की मोदी लहर में भी पंजाब के नतीजे अलग थे और आज की स्थिति में भी यहां मोदी फैक्टर उतना प्रभावशाली नहीं दिख रहा। क्यों?

- यह वह 'मिथ' है जिसे तथाकथित विश्लेषकों ने अपने अनुसार खड़ा किया है। 23 मई के नतीजे इस मिथ को तो तोड़ ही देंगे, सो सिर्फ इतना बोलूंगा कि अगर सिखों पर मोदी मैजिक काम नहीं करता  तो क्या हमारा गठबंधन दिल्ली के विधानसभा चुनावों में भी काम करता? क्या हरियाणा या अन्य जगह भाजपा इस गठबंधन की बात करती? यह इस गठबंधन का मैजिक ही है कि दिल्ली में भी अब अकाली दल ने सिख बहुल क्षेत्रों में भाजपा के चुनाव निशान पर चुनाव लड़ कर भी जीत प्राप्त की।

- लेकिन राजनीतिक विशलेषक तो सिखों और मोदी मैजिक के बीच की दूरी को मोदी के साथ जुड़ी 'सांप्रदायिक अतिवाद' की छवि मानते हैं । क्या ऐसा कुछ है ?

- बिल्कुल गलत, यह सब नकारात्मक सोच वाले लोगों की उपज है। जब उन्हें कहने कुछ नहीं मिलता तो मोदी को सांप्रदायिक सोच वाला बताने लग जाते हैं। मैं नहीं मानता कि पिछले पांच वर्षों में उन्होंने बतौर प्रधानमंत्री कोई ऐसा फैसला लिया हो जो किसी धर्म, जाति या समुदाय विशेष के अहित में हो। उनके कार्यकाल में जो भी फैसले हुए उनके पीछे सिर्फ और सिर्फ देश का आर्थिक एजेंडा ही केंद्र बिंदू रहा है। हां, यह अलग बात है कि मीडिया के उस वर्ग ने, जो खुद सांप्रदायिकता के दंश से प्रभावित है, उसने उनके हर फैसले का आंकलन धर्म, जाति और सामुदायिक राजनीति से जोड़कर करते हुए उनकी छवि को अलग रंग देने की कोशिश की। पंजाब और सिख समुदाय के लिए जो उन्होंने किया वह तो आज तक कोई प्रधानमंत्री कर ही नहीं सका है।

- लेकिन कांग्रेस का कहना है कि मोदी सरकार के शुरुआती तीन साल में जब पंजाब में अकाली- भाजपा सरकार थी उस दौरान केंद्र से कुछ खास हासिल ही नहीं हुआ ... या यूं कहें की पूरी अनदेखी हुई पंजाब और पंजाबियों की?

- (बीच में ही टोकते हुए) क्या बात करते हैं... पंजाब और विशेषकर सिख समुदाय ने अगर सबसे अधिक कुछ हासिल किया है तो वह मोदी के पिछले पांच सालों में ही किया है। देश में कितनी केंद्र सरकारें आईं और गईं, चाहे वह कांग्रेस की हो या फिर भाजपा की, लेकिन मोदी सरकार में वह सब हो गया जो मुमकिन ही नहीं लगता था। किस प्रधानमंत्री के नेतृत्व में सिखों को 84 के दंगों में न्याय मिलने की न सिर्फ उम्मीद जगी , बल्कि न्याय मिलना भी शुरू हो गया ? यह संभव हुआ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दंगाइयों के प्रति कड़े रुख से। विश्वभर के सिखों के आस्था के केंद्र पाकिस्तान स्थित गुरुद्वारा श्री करतारपुर साहिब को पंजाब से जोड़ते कारिडोर की जहां मंजूरी मिली, वहीं पंजाब को एम्स, आइआइएम, डिफेंस अकादमी जैसे राष्ट्रीय स्तर के संस्थान मिले। पंजाब का हर जिला हेडक्वार्टर 30 हजार करोड़ के राष्ट्रीय राजमार्ग प्रोजेक्ट के तहत 4-6 लेन वाले सड़क नेटवर्क से जुड़ गया। क्या इन सबको भी आप पंजाब के लिए छोटी सी देन मानते हैं? केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली के पांचों बजट में पंजाब को विशेष तरजीह दी। देखो हर बात को कर्जमाफी या 'कैश पेमेंट' से नहीं तो आंका जा सकता। इन तमाम फैसलों ने पंजाबियों के लाइफ स्टाइल में अभूतपूर्व परिवर्तन किया। इसी कारण आज पंजाबी भी दिल से कहते हैं मोदी है तो मुमकिन है।

- चलिए अब थोड़ा राष्ट्रीय मसलों से हट कर पंजाब की बात करें। यहां पिछले विधानसभा चुनाव में भी बेअदबी एक अहम मुद्दा था जिसे आपकी पार्टी की हार का कारण भी माना गया। इस बार भी यह एक बड़ा चुनावी मसला है जो अकाली दल को भारी पड़ सकता है। क्या आप इसे एक बड़ा मुद्दा मानते हैं?

- सबसे पहले बेअदबी घटनाक्रम को लेकर स्पष्ट कर दूँ कि जिन लोगों ने भी बेअदबी की घटनाओं को अंजाम दिया या इसे प्लान किया उन्हें कठोर से कठोर दंड मिलना चाहिए। ऐसे शख्स मानसिक तौर से संकीर्ण सोच वाले है सो इसमें कोई दो राय नहीं कि उनपर कोई रहम हो या उन्हें ढुल-मुल रवैये से डील किया जाना चाहिए। मेरा या आपका ही नहीं पूरे विश्व में हर सिख का यह मानना है कि ऐसे व्यक्ति का पकड़ा जाना या उसे पकड़ कर सलाखों के पीछे करना बहुत जरूरी है। हमारी सरकार ने भी इस बात की बहुत कोशिश की और निष्पक्ष जांच के लिए सीबीआई को केस दिया। दरअसल जांच को लेकर हमारे खिलाफ 'फॉल्स प्रोपेगंडा' (गलत प्रचार) किया गया। आज कैप्टन अमरिंदर की सरकार को बने हुए भी दो साल हो गए हैं। क्या इन घटनाओं को अंजाम देने वाले व्यक्ति को पकड़कर उन्होंने सलाखों के पीछे किया। नहीं, जांच की स्थिति आज भी वही है जो हमारी सरकार के समय थी । हां इतना फर्क जरूर है की बेअदबी की घटनाओं को लेकर या इससे जुड़े किसी भी मसले को लेकर अकाली - भाजपा गठबंधन सरकार ने कभी भी राजनीति नहीं की जबकि हमेशा से ही सिखों की भावनाओं से खिलवाड़ करने वाली कांग्रेस ने इस दुखद घटनाक्रम का भी राजनीतिकरण कर दिया। असली गुनाहगार की न तो पहचान हुई न कोई पकड़ा गया। खानापूर्ति के नाम पर दो तीन पुलिस अधिकारियों को पकड़ लिया। कैप्टन ने अपनी हर कमी और सरकार की हर विफलता को छुपाने के लिए बेअदबी को ढाल बनाना शुरू कर दिया है। लेकिन लोग सब जानते हैं और आने वाले नतीजे सब साफ कर देंगे।

-चलो मान लेते हैं कांग्रेस बेअदबी पर राजनीति कर रही है लेकिन ऐसा क्या हुआ कि आपके अपने ही शिरोमणि अकाली दल की वरिष्ठतम लीडरशिप में आप के खिलाफ रोष इस कदर बढ़ा कि अकाली दल एक बार फिर विघटित हुआ, क्यों ?

- किस शीर्ष नेतृत्व की बात कर रहे हैं आप? उन नेताओं की जो अपनी उम्र के ऐसे पड़ाव पर पहुंच चुके थे जहां अमूमन रिटायरमेंट लेनी ही पड़ती है। पार्टी से बढ़कर कोई भी नहीं होता। बेशक मैं ही हूं... मेरा वजूद भी पार्टी के कारण है और यही नियम सब पर लागू होता है। अकाली दल को ना तो कोई कभी तोड़ सका है और ना तोड़ कर मिटा सकेगा। रिटायरमेंट पर बैठे जिन लोगों को अपना वजूद खत्म होता दिखाई दिया तो कांग्रेस के इशारे पर बेअदबी को एक बहाना बनाकर उन्होंने ऐसी बातें करनी शुरू कर दी।

- एक तरफ आप कह रहे हैं कि ये सब लोग अपनी रिटायरमेंट की उम्र तक पहुंच चुके थे दूसरी तरफ आप ही की पार्टी ने इनमें से कई को 2017 के विधानसभा चुनाव में टिकट भी दी। यह विरोधाभास क्यों?

- पार्टी के विस्तार में पूर्व में उनका जो भी योगदान रहा है उसे कभी भी इग्नोर नहीं किया जा सकता। पार्टी प्रधान बनने से पहले भी और बाद में भी मैं हमेशा उनका आदर करता रहा हूं। मेरे लिए वे सब पिता समान हैं। मैंने जब पिछले चुनाव में टिकट वितरण किया तो इसी सम्मान सूचक दृष्टिकोण से सब को टिकट दी गई। इतना ही नहीं, उनमें से कई चुनाव हार गए और हारने के बावजूद उन्हें पार्टी के कुछ महत्वपूर्ण पदों , यहां तक कि राज्यसभा का मेंबर तक बनाने का स्वयं प्रस्ताव रखा। यह सब आदर की भावना से ही किया। आज भी मैं उनका बहुत आदर करता हूं लेकिन मैंने पहले भी कहा कि पार्टी के हित सबसे ऊपर होते हैं। अगर पार्टी है तो हम हैं और अगर पार्टी नहीं तो न हमारा कोई वज़ूद और न ही ऐसे रिश्तों का जिससे पार्टी की छवि बिगड़े।

-लेकिन जिस भी वरिष्ठ अकाली दल के नेता ने पार्टी छोड़ी उसने सुखबीर सिंह बादल और उनकी कार्यशैली पर व्यक्तिगत हमले ही क्यों किए?

- इसका जवाब तो मुझ से बेहतर वह लोग ही दे सकते हैं। मैं तो इतना कह सकता हूं कि जब भी कोई मेहनत कर तरक्की करता है तो उसके प्रशंसक कम और विरोधी ज्यादा मुखर होते हैं। सरकारी दफ्तर हो या प्राइवेट कंपनी , खेल का मैदान हो या राजनीतिक अखाड़ा.. यही दुनिया का दस्तूर है। मेरी बात छोडि़ए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही ले लें। वह आज हर एक के टारगेट पर क्यों हैं ? आज के दौर में भाजपा के बारे में कम लेकिन नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत टिप्पणियां ज्यादा होती हैं। जब आप इस दस्तूर को समझ जाएंगे तब आपको अपने सवाल का जवाब मिल जाएगा।

- आपका मतलब सुखबीर सिंह बादल की कार्यशैली पर जो सवाल उठते रहे हैं वह सब बेमानी है। विरोधी दलों के मंच और सोशल मीडिया पर सुखबीर बादल को 'गप्पी' या 'दिन में सपने देखने वाला' वह नेता जो आंकड़ों में हेरफेर कर सच्चाई को छुपाने का हुनर सीख चुका है बताना... इन सबका कोई मूल नहीं?

- यह सब तो उसी दिन से कहने लग गए थे जिस दिन मैं पॉलिटिक्स में आया था। बोलने वाले बोलते रहे और आज भी बोल रहे हैं, कोई फर्क नहीं पड़ता। 2012 में जब मैं दोबारा सरकार बनाने का दावा कर पंजाब का चुनावी इतिहास बदलने की बात करता था तब भी यह लोग मुझे ऐसे ही संबोधित करते थे। जब मैं पानी में बस चलाने या पंजाब में तीन चार एयरपोर्ट खोलने की बात करता था तब भी मुझ पर ऐसे ही तंज कसे जाते थे। लेकिन जब सब कुछ वैसा हुआ जैसा मैं दावा करता था, यही लोग जिसमें आज अकाली दल छोड़ मुझे निशाने पर लेने वाले लोग भी शामिल हैं , इसी सुखबीर बादल को 'पंजाब का भविष्य' या अन्य ऐसी उपाधियों से नवाज गुणगान करने लग गए थे। न तो मैं कभी ऐसे गुणगान से बहुत खुश हुआ और न ही कभी आलोचना से विचलित। सुबह घर से निकलता हूं तो मान कर चलता हूं कि कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना।

- ड्रग्स की बात करें तो आप जब सत्ता में थे आपने कभी भी ड्रग्स को मुद्दा नहीं माना लेकिन आज जब सत्ता से दूर हैं तो ड्रग्स को एक मुद्दा बना इसे कैप्टन अमरिंदर सरकार की विफलता बता रहे हैं।  जो ड्रग्स की समस्या पहले मुद्दा नहीं थी उसे आज आपके कहने पर जनता चुनावी मुद्दा क्यों माने ?

- ड्रग्स की समस्या जितनी हमारी सरकार के समय थी,  उतनी ही, शायद उससे अधिक ही, आज भी है। मैंने अपने कार्यकाल में कभी भी यह नहीं कहा की यह प्रदेश की समस्या नहीं है। मैं या मेरी हमारी सरकार खिलाफ थी तो इस बात के कि इस समस्या के चलते पंजाब और पंजाबियों को बदनाम न किया जाए। मैंने कभी हाथ में पवित्र गुटका साहिब की कसम खाकर यह नहीं कहा कि मुझे सत्ता दो मैं तीस दिन में इस समस्या को जड़ से उखाड़ दूंगा। यह ड्रग्स पड़ोसी मुल्क से यहां आती हैं और इसका हल भी बॉर्डर से ही निकलेगा न की झूठी कसमें खा लोगों को गुमराह कर। अगर आज मैं ड्रग्स की बात करता हूं तो अमरिंदर की झूठी सौंगंध की करता हूं न की पंजाब या पंजाबियों को बदनाम करने के लिए।

 बातचीत के खास बिंदु -

- मोदी मोदी सांप्रदायिक होते तो क्या सिखों को इतना कुछ मिलता

- मोदी ने  पंजाब और सिख समुदाय के लिए जो किया वह  आज तक कोई प्रधानमंत्री कर ही नहीं सका

- पंजाब की जरूरत है अकाली दल व भाजपा का रिश्ता

- रिटायरमेंट पर लोग वजूद खत्म होत देख कांग्रेस के इशारे पर बेअदबी को एक बहाना बना रहे

- अकाली दल को ना तो कोई कभी तोड़ सका है और ना तोड़ कर मिटा सकेगा

- ड्रग्स की समस्या जितनी हमारी सरकार के समय थी उससे अधिक आज भी

- व्‍यक्तिगत आलोचना प्रभावित नहीं करती, घर से यह सोचकर निकलता हूं कि कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना

 

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Posted By: Sunil Kumar Jha

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