चंडीगढ़ [इन्द्रप्रीत सिंह]। यहां से 35 किलोमीटर दूर रामगढ़ फोर्ट के पास 11 एकड़ बंजर जमीन आज Food forest में बदल गई है। इस Food forest में बारिश के पानी से फसलें लहलहा रही हैैं। साल भर में करोड़ों लीटर पानी की बचत हो रही है। यह सब मनीषा और उनके पति अगम की साढ़े आठ साल की मेहनत का नतीजा है।

पहले मुंबई और अब गुरुग्राम में एक Corporate company में काम करने वाली मनीषा और उनके पति को मुंबई में रहते अहसास हुआ कि अगर भोजन, पानी व हवा ही साफ नहीं है तो पैसा कमाना भी व्यर्थ है। पर्यावरण की जिम्मेदारी सिर्फ किसानों पर नहीं छोड़ी जा सकती है। इस पर काम कैसे करें, यह समझ नहीं आ रहा था।

मनीषा बताती हैं कि उनकी या उनके परिवार की पृष्ठभूमि कभी किसानी से संबंधित नहीं रही। उनकी मुंबई में रहने वाली एक मित्र ने उनसे परमाकल्चर (सतत कृषि) के बारे में बात की तो उन्होंने तय कर लिया कि वह जीरो से शुरू करके इसे अंत तक लेकर जाएंगी। जब उनके पति ने चंडीगढ़ के पास जमीन देखी तो उन्होंने फैसला किया कि वह इस पर ऐसा जंगल खड़ा करेंगी जहां से न केवल साफ-सुथरा भोजन मिले, बल्कि पानी को भी बचाया जा सके और जमीन की गुणवत्ता को ठीक किया जा सके। 

रामगढ़ फोर्ट के पास बंजर जमीन को Food forest में बदलने वाली मनीषा।

रामगढ़ फोर्ट के पास गगनचुंबी पेड़ों में मनीषा व अगम की मेहनत दिखाई देती है। परमाकल्चर मॉडल में उनका Food forest पहाड़ों की तलहटी पर बना हुआ है जिसकी अपनी समस्याएं हैं। पहाड़ों पर होने वाली बारिश का पानी तेजी से उनके खेतों से होकर गुजरता है जो एक बहुत बड़ी समस्या थी।

मनीषा बताती हैं कि पानी का बहाव इतना तेज होता है कि उसमें खड़ेे भी नहीं हो सकते। उन्होंने इस समस्या का भी हल निकाला। सात से दस छोटे और तीन बड़े तालाब खुदवाकर पानी इसमें स्टोर किया। हर छोटे से बड़े तालाब के बीच पानी को एक प्राकृतिक सिस्टम के जरिये पहुंचाया जाता है, ताकि ज्यादा से ज्यादा समय तक पानी जमीन में रहे। बकायदा तालाबों की मैपिंग की हुई है। एक बारिश यदि उनका एक तालाब भर देती है तो उसमें करीब तीस लाख लीटर पानी जमा हो जाता है।

इस तरह करती हैैं खेती

मनीषा बताती हैैं कि उनके Food forest में अब बारिश का पर्याप्त पानी इकट्ठा हो गया है। यहां ट्रैक्टर चलाना गुनाह है। पेड़ों के पत्तों व टहनियों के छोटे टुकड़ों को बेड बनाकर उसमें फैला दिया है और उसमें ही सब्जियां, दालें आदि बीजी जा रही हैं। इससे इन क्यारियों में लगाए गए पानी का वाष्पीकरण नहीं होता।

बाजार पर नहीं हैैं निर्भर

नमक और मसालों को छोड़कर आज कोई ऐसा खाद्य पदार्थ नहीं है जिसके लिए मनीषा को बाजार पर निर्भर होना पड़े। उन्होंने बताया कि उनके पति ने कारपोरेट जगत को छोड़ दिया है। अब वह या तो फार्म पर ध्यान देते हैं या फिर अपना सामाजिक दायरा बढ़ाने पर काम कर रहे हैं। दो साल बाद वह खुद भी नौकरी को अलविदा कर देंगी। उनकी सफलता को देखकर उनकी कंपनी में काम करने वाले कई लोगों ने जमीन लेकर इस तरह के प्रयोग शुरू किए हैं।

यह है परमाकल्चर

परमाकल्चर का मतलब है सतत कृषि। इसमें प्रकृति के साथ चलना होता है। पौधों और पशुओं की हर गतिविधि पर अध्ययनशील दृष्टि रखनी होती है। सिर्फ परिश्रम करने की जगह विचारवान दृष्टि विकसित करनी होती है।

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Posted By: Kamlesh Bhatt

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