चंडीगढ़ पुलिस की कार के साथ एक्सीडेंट, दर्ज किया NDPCS का पर्चा; Court में खुली फर्जी गिरफ्तारी की पोल
चंडीगढ़ पुलिस की नशा तस्करी मामले में फर्जी गिरफ्तारी की पोल अदालत में खुल गई, जिसके बाद आरोपित को बरी ...और पढ़ें

पंचकूला जिला अदालत ने सुनाया फैसला। (सांकेतिक फोटो)
HighLights
पुलिस की फर्जी गिरफ्तारी कोर्ट में साबित, आरोपित बरी।
नशा तस्करी के झूठे आरोप से युवक को मुक्ति मिली।
पुलिसकर्मी अपने ही थाने की तस्वीर नहीं पहचान सके।
जागरण संवाददाता, चंडीगढ़। नशा तस्करी के एक मामले में पुलिस की फर्जी गिरफ्तारी की पोल जिला अदालत में खुल गई, जिसके चलते आरोपित आशुतोष सोढ़ा को बरी कर दिया गया। उसका केस लड़ने वाले एडवोकेट दीक्षित अरोड़ा ने कहा कि पुलिस ने उसे झूठे केस में फंसाया गया था।
दिन में करीब दो बजे सेक्टर-40/41 डिवाइडिंग रोड पर आशुतोष की गाड़ी की पुलिसकर्मियों के वाहन के साथ टक्कर हुई थी। पुलिसकर्मियों ने पहले तो उसे बुरी तरह पीटा। फिर उसकी गाड़ी का शीशा तोड़ा और उसे थाने ले जाया गया। उसकी गाड़ी भी थाने में खड़ी कर दी गई। यह सब कुछ दिन के समय हुआ था।
वहीं, पुलिस ने जो कहानी बनाई थी उसमें कहा गया कि आशुतोष को रात करीब 9.10 बजे सेक्टर-39 में नाके पर चेकिंग के दौरान गिरफ्तार किया गया। उसके पास पाॅलीथीन थी जिसमें 24 नशीले इंजेक्शंस थे।
एडवोकेट अरोड़ा ने सवाल उठाया कि अगर आशुतोष को रात के समय नाके पर अचानक चेकिंग के दौरान पकड़ा गया तो उसकी गाड़ी दिन के समय थाने में कैसे पहुंची। इस बात का पुलिस के पास कोई स्पष्ट जवाब नहीं था।
इसके अलावा शाम करीब 4.47 बजे आशुतोष ने थाने से ही अपनी मां को फोन कर बता दिया था कि उसे पुलिस ने एक्सीडेंट केस में गिरफ्तार किया है। बचाव पक्ष ने यह काॅल डिटेल और मोबाइल टावर लोकेशन अदालत में पेश कर दी, जिससे यह साबित हुआ कि शाम के समय आशुतोष के फोन की लोकेशन सेक्टर-39 थाने के आसपास ही थी।
अपने ही थाने को पहचान नहीं सके पुलिसकर्मी
कोर्ट में बचाव पक्ष ने एक तस्वीर पेश की। इस तस्वीर में आरोपित आशुतोष की गाड़ी नजर आ रही थी। वह गाड़ी सेक्टर-39 के पुलिस थाने में खड़ी थी। बचाव पक्ष के वकील ने इस गाड़ी की तस्वीर पुलिसकर्मियों को दिखाई, लेकिन ज्यादातर ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि यह कौन सा थाना है। इनमें खुद जांच अधिकारी एएसआई परमिंदर सिंह भी था।
उसने भी तस्वीर देखकर थाने की पहचान नहीं की जबकि उस तस्वीर में गाड़ी के साथ थाने की बिल्डिंग भी नजर आ रही थी। ऐसे में पुलिस का केस काफी कमजोर पड़ गया। ऊपर से पुलिसकर्मियों के टालमटोल वाले जवाबों ने गिरफ्तारी पर और संदेह पैदा कर दिया।
