चंडीगढ़ में वार्ड आरक्षण के बाद टिकट की जंग तेज, राजनीतिक दलों को निगम चुनाव के लिए जीताऊ चेहरे की तलाश
चंडीगढ़ में वार्ड आरक्षण के बाद निगम चुनाव के लिए टिकट की जंग तेज हो गई है। राजनीतिक दल जीताऊ ...और पढ़ें

चंडीगढ़ निगम चुनाव के लिए वार्ड आरक्षण के बाद अब टिकट वितरण का राजनीतिक खेल शुरू। (सांकेतिक फोटो)
HighLights
वार्ड आरक्षण के बाद चंडीगढ़ में टिकट वितरण की जंग तेज।
भाजपा, कांग्रेस, आप में जीताऊ चेहरों की तलाश जारी।
स्थानीय बनाम बाहरी उम्मीदवार पर भी राजनीतिक घमासान।
राजेश ढल्ल, चंडीगढ़। नगर निगम चुनाव के लिए वार्ड आरक्षण की तस्वीर साफ होते ही अब असली राजनीतिक खेल टिकट वितरण का शुरू हो गया है। 35 वार्डों में 16 वार्ड आरक्षित होने से कई मौजूदा पार्षदों की चुनावी जमीन खिसक गई है, जबकि 19 सामान्य वार्ड ऐसे हैं जहां टिकट के दावेदारों की कतार लंबी हो गई है।
अब भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने-अपने संगठन में सक्रिय नेताओं में से जीताऊ चेहरा चुनने की है ।टिकट वितरण में गुटबाजी भी हावी होगी । जबकि कांग्रेस और भाजपा अपने कुछ सिटिंग पार्षदों की भी टिकट काटने जा रही है ।
भाजपा के लिए चुनौती सबसे बड़ी पार्टी की स्थिति को बनाए रखने की होगी। पार्टी के सामने मौजूदा पार्षदों, पुराने संगठन पदाधिकारियों और नए प्रभावशाली चेहरों के बीच संतुलन बनाने का सवाल रहेगा।
पार्टी पहले से संभावित उम्मीदवारों की जीतने की क्षमता को परखने के लिए सर्वे पर जोर दे रही है। ऐसे में केवल वरिष्ठता या संगठन में सिफारिश टिकट की गारंटी नहीं होगी। जिस नेता की वार्ड में व्यक्तिगत पकड़, मतदाताओं से सीधा संपर्क और चुनाव जीतने की संभावना मजबूत होगी, उसे प्राथमिकता दी जाएगी।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती गुटीय संतुलन और वापसी की होगी। हालिया राजनीतिक आकलनों में कांग्रेस को चंडीगढ़ में भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जा रहा है। जिन वार्डों में स्थानीय स्तर पर मजबूत संगठन और लंबे समय से सक्रिय नेता मौजूद हैं, वहां बाहर से किसी बड़े चेहरे को उतारने का फैसला स्थानीय असंतोष पैदा कर सकता है।
आप के सामने सबसे अलग चुनौती है। 2021 में पहली बार निगम चुनाव लड़कर 14 सीटें जीतने वाली पार्टी की मौजूदा ताकत बाद में राजनीतिक बदलावों के कारण प्रभावित हुई है। अब पार्टी नए और युवा चेहरों को आगे लाने पर जोर दे रही है।
पत्नियों को चुनावी मैदान में उतारने की रणनीति
आरक्षण ने उन नेताओं के सामने भी नई चुनौती खड़ी कर दी है, जिनका मौजूदा वार्ड महिला या अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गया है। ऐसे नेता दूसरे वार्ड से टिकट की कोशिश कर रहे हैं।
यहीं से स्थानीय बनाम दूसरे वार्ड के उम्मीदवार की लड़ाई भी महत्वपूर्ण हो जाएगी ।इस समय जिन पार्षदाें के वार्ड जनरल महिला के लिए रिजर्व हो गए हैं उनमे से अधिकतर ने अपनी पत्नियों को मैदान में उतारने की रणनीति बनाई है।
लोकल बनाम बाहरी उम्मीदवार, किस पर दांव
वार्ड आरक्षण ने कई नेताओं और दावेदारों की रणनीति पानी फेर दिया है ।जिनके वार्ड एससी के लिए रिजर्व हुए हैं वहां से सिटिंग पार्षदों ने फिर से जीतने के लिए काफी काम करवाया है लेकिन अब उन्हें इसका फायदा नहीं मिलेगा।
दूसरे वार्ड में जाकर चुनाव लड़ने से वहां पर लोकल और बाहरी उम्मीदवार का मुद्दा हावी रहेगा। हालांकि, भाजपा ने साल 2021 में करीब 20 बाहरी उम्मीदवार मैदान में उतारे थे लेकिन इनमे से सिर्फ एक को जीत हासिल हुई थी।
आम आदमी पार्टी ने अधिकतर लोकल उम्मीदवार को मैदान में उतारा था जिसका उन्हें फायदा मिला था और सबसे ज्यादा सीटें आप ने ही जीती थी। कांग्रेस ने 12 बाहरी उम्मीदवार मैदान में उतारे थे जिनमे से काेई भी चुनाव नहीं जीता।
2021 में 203 उम्मीदवारों ने लड़ा था चुनाव
2021 के निगम चुनाव में 35 वार्डों के लिए 203 उम्मीदवार मैदान में थे। इनमें से 35 उम्मीदवार पार्षद बने थे । आम आदमी पार्टी ने 14 सीटें जीतीं, भाजपा ने 35 में से 12 और कांग्रेस ने आठ सीटें हासिल की थीं।
साल 2021 में कई मुकाबले बेहद करीबी रहेवार्ड नंबर 34 में जीत का अंतर सिर्फ नौ वोट, वार्ड नंबर 2 में 11 और वार्ड नंबर 4 में 12 वोट रहा।कांग्रेस अध्यक्ष एचएस लक्की का कहना है कि जीतने वाले उम्मीदवारों को मैदान में उतारा जाएगा।
राजनीतिक विश्लेषक की राय
पंजाब यूनिवर्सिटी के राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर भारत का मानना है कि चुनाव में स्थानीय उम्मीदवार को अपनी पहचान, जनसंपर्क और मतदाताओं से प्रत्यक्ष जुड़ाव के कारण स्वाभाविक बढ़त मिलती है। लोकतंत्र में जीत का आधार केवल ‘स्थानीय’ होना नहीं, बल्कि विश्वसनीयता, स्वीकार्यता और जनता के बीच निरंतर उपलब्धता होता है।
बाहरी उम्मीदवार के लिए सबसे बड़ी चुनौती स्थानीय ‘अपनापन’ स्थापित करना होती है, जिसे मजबूत संगठन, प्रभावी जनसंपर्क और स्थानीय नेतृत्व के समर्थन से काफी हद तक दूर किया जा सकता है। मतदाता के लिए वास्तविक सवाल ‘बाहरी बनाम स्थानीय’ का नहीं, बल्कि 'स्वीकार्य बनाम अस्वीकार्य' का होता है।
