बलवान करिवाल, चंडीगढ़

वर्ष 2008 से लंबित सेल्फ फाइनेंसिग इंप्लाइज हाउसिग स्कीम को यूटी प्रशासन ने अब सिरे लगाने की तैयारी कर ली है। अब इस स्कीम को और लंबा खींचने की बजाए किसी न किसी तरीके से हल करने की प्लानिग की गई है। इसके लिए प्रशासन ने जो तीन विकल्प इंप्लाइज के सामने रखे थे अब उन्हीं विकल्पों को पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट में भी एफिडेविट पेश कर रखा गया है। उसमें यह भी कहा गया है कि इन तीन विकल्पों से कर्मचारियों को कोई एक चुनना होगा। प्रशासन कोशिश कर रहा है कि इन तीनों विकल्पों में से किसी एक विकल्प पर इंप्लाइज को राजी किया जाए। पहले दो विकल्प पर कर्मचारी राजी नहीं होते हैं तो तीसरे विकल्प में कर्मचारियों की जमा अग्रिम राशि को ब्याज सहित वापस किया जाएगा।

हालांकि यूटी इंप्लाइज हाउसिग वेलफेयर सोसायटी ने प्रशासन के इन तीनों विकल्पों को खारिज कर दिया है। तीनों को ही सही नहीं बताया है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि उन पर कोई विकल्प थोपा नहीं जा सकता। सोसायटी के महासचिव डा. धर्मेंद्र ने कहा कि वह प्रशासन के यह तीनों विकल्प खारिज कर चुके हैं। प्रशासन ने 2008 में स्कीम का जो ब्राशर जारी किया था उसी के तहत कर्मचारियों को मकान मिलने चाहिए।

प्रशासन ने दिए यह तीन विकल्प

पहला-

इस विकल्प में कर्मचारियों को स्टिल्ट पार्किंग के अतिरिक्त दस मंजिल टावर बनाकर फ्लैट मुहैया कराए जाएंगे। इसमें कम जमीन का इस्तेमाल होगा। फ्लैट रेट उतने महंगे नहीं होंगे जितने कम मंजिल का टावर बनाने से पड़ रहे हैं। कर्मचारी इस विकल्प को खारिज कर चुके हैं। दूसरा-

दूसरे विकल्प में कर्मचारियों को स्टिल्ट पार्किंग के अतिरिक्त छह मंजिला इमारत बनाकर दी जाएगी। इसमें बिल्डिग की ऊंचाई कम होगी। प्रत्येक टावर में फ्लैट की संख्या कम होगी। इसको भी कर्मचारी पहले कई चर्चा के दौरान नकार चुके हैं। कर्मचारी केवल बिल्ट अप एरिया के हिसाब से फ्लैट के रेट चाहते हैं। जबकि प्रशासन पूरे प्रोजेक्ट में इस्तेमाल होने वाली जमीन को कंस्ट्रक्शन कोस्ट के साथ जोड़कर फ्लैट के रेट चाहते हैं। जमीन का वर्तमान मार्केट रेट जोड़ा जा रहा है। तीसरा-

ड्रा के बाद स्कीम में 3940 इंप्लाइज का नाम फाइनल हुआ था। इन इंप्लाइज से फ्लैट की कुल कीमत का 25 फीसद हिस्सा जमा करा लिया गया था। प्रत्येक इंप्लाइज से 25 फीसद राशि लेने के बाद प्रशासन के पास कुल 58 करोड़ रुपये जमा हुए थे। इतने वर्षों से 58 करोड़ रुपये सीएचबी के पास जमा है। अब अगर कर्मचारी पहले दोनों विकल्प पर राजी नहीं होते तो यह 58 करोड़ ब्याज सहित लौटने का तीसरा विकल्प रखा गया है। केंद्र सरकार इस स्कीम के लिए 61.5 एकड़ जमीन नए रेट पर देने की मंजूरी दे चुकी है। इसलिए जमीन कम होने या न होने का अब प्रशासन बहाना नहीं बना सकता। इंप्लाइज कई गुणा कीमत पर फ्लैट लेने को तैयार नहीं है। साथ ही प्रशासन के तीनों विकल्पों को भी उनका अधिवक्ता कोर्ट में खारिज कर चुका है।

- डा. धर्मेंद्र, जनरल सेक्रेटरी, यूटी इंप्लाइज हाउसिग वेलफेयर सोसायटी।

Edited By: Jagran