जागरण संवाददाता, चंडीगढ़ : राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय शिक्षा संस्थान (मानव संसाधन विकास मंत्रालय भारत सरकार) जो स्नातक स्तर से नीचे तक के विभिन्न प्रकार के शिक्षार्थियों को शिक्षा प्रदान करता है, को 1979 में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) द्वारा एक परियोजना के रूप में चलाया गया था, इसमें कुछ अंतनिर्हित सुविधाएं दी गई थीं। इस संबंध में संस्थान के क्षेत्रीय निदेशक डा. तारकेश्वर नाथ गिरि का मानना है कि 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति द्वारा यह सुझाव दिया गया कि देश भर में माध्यमिक स्तर पर अवस्थाबद्ध रूप में मुक्त शिक्षा की सुविधाएं प्रदान करने के लिए मुक्त विद्यालय प्रणाली को एक स्वतंत्र प्रणाली के रूप में सशक्त किया जाए जिसमें इसकी अपनी पाठ्यचर्या हो और परीक्षा हो जिसमें उत्तीर्ण होने पर प्रमाणपत्र दिया जाए।

इसके परिणामस्वरूप मानव संसाधन विकास मंत्रालय भारत सरकार ने नवंबर 1989 में राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय स्थापना की। 2002 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा संगठन का नाम राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय से बदलकर राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान किया गया। इसका उद्देश्य औपचारिक प्रणाली के विकल्प के रूप में मुक्त शिक्षा प्रणाली द्वारा प्राथमिकता प्राप्त शिक्षार्थी समूहों को पूर्व स्नातक स्तर की शिक्षा प्रदान करना है जो मानक राष्ट्रीय नीति दस्तावेजों के अनुरूप हो और लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति करती हो और इसके द्वारा वह निम्नलिखित उद्देश्यों में योगदान दे सकें।

शिक्षा के सार्वभौमिकीकरण में। समाज में बेहतर समता और न्याय लाने के लिए और एक शिक्षित समाज के निर्माण के लिए।

उन्होंने बताया कि शिक्षार्थी को पांच वर्ष की अवधि में अधिकतम नौ बार परीक्षा देने की सुविधा दी गई है। जब तक शिक्षार्थी प्रमाणपत्र के लिए आवश्यक विषयों में उत्तीर्ण नहीं होताए तब तक उसके क्रेडिट एकत्र होते रहते हैं। एनआइओएस सात माध्यमों, हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मराठी, तेलुगू, गुजराती, मलयालम, में 26 विषयों में माध्यमिक परीक्षाएं और हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू माध्यमों में विषयों मे उच्चतर माध्यमिक स्तर पर 19 और उच्चतर माध्यमिक स्तर पर 20 व्यावसायिक विषयों को शैक्षिक विषयों के संयोजन में चलाने का प्रावधान भी रखता है।

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