चंडीगढ़ [निर्मल सिंह मानशाहिया]। पंजाब के स्कूलों में 2008 में सर्वशिक्षा अभियान और राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के अंतर्गत भर्ती हुए 8886 शिक्षक अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। सरकारी स्कूलों में 10 साल के करीब पढ़ाने के बाद जब स्थायी होने का समय आया तो सरकार का कहना है कि यदि स्थायी होना है तो पहले ढाई साल 42800 वेतन छोड़कर 15 हजार के वेतन पर काम करो। दूसरी ओर अध्यापकों का कहना है कि उनको सरकार के ही सरकारी स्कूलों में पढ़ाते हुए दस वर्ष हो गए हैं, इसलिए उन्हें पूरे वेतन पर ही पक्का किया जाए।

पिछले 5 माह से बिना वेतन पढ़ा रहे अध्यापक आखिरकार मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के शहर पटियाला में मरणव्रत पर बैठे हैं। दूसरी ओर शिक्षामंत्री ओपी सोनी इस मामले को लेकर अध्यापकों के साथ टकराव पर उतर आए हैं। सरकार का कहना है कि उन्हें तभी पक्का किया जाएïगा यदि वे सहमति दें कि अगले तीन साल 15000 वेतन पर काम करेंगे। इसके लिए सरकार ने उन्हें 15 दिन का समय दिया है।

मंत्री की सख्ती के खिलाफ स्टेट अवार्ड लौटाया

सरकार की अध्यापक विरोधी नीतियों से दुखी होकर जिला बठिंडा के स्टेट अवार्डी शिक्षक परमजीत सिंह ने अपना अवार्ड वापस कर दिया है। उनका कहना है कि पंजाब सरकार ने रमसा और एसएसए अध्यापकों का वेतन 42 हजार से घटाकर 15 हजार कर दिया है, इसीलिए हजारों अध्यापक सड़कों पर उतर कर संघर्ष करने को मजबूर हुए हैं। कहा कि जब यह अवार्ड मिला था तब बहुत खुशी हुई थी, लेकिन आज यह अवार्ड मात्र कागज का टुकड़ा लग रहा है। परमजीत इस समय सरकारी हाई स्कूल गोनियाना खुर्द में आर्ट एंड क्राफ्ट के शिक्षक हैं।

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Posted By: Kamlesh Bhatt