जागरण संवाददाता, बठिडा :

सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद पुलिस व प्रशासन की सख्ती भी किसानों को पराली जलाने से नहीं रोक पाई। बेशक गत सप्ताह पराली जलाने के मामले में 100 से ज्यादा केस दर्ज कर 250 के करीब किसानों को नामजद भी किया। मगर इसके बाद भी पराली जलाने से किसान पीछे नहीं हटे। जिसका सबसे बड़ा कारण है कि पराली जलाने के मामले में जो धारा लगाई जाती है, उसमें से तुरंत जमानत मिल जाती है। जिस कारण किसान भी पराली को लगातार आग के हवाले कर रहे हैं। बेशक अब पंजाब सरकार ने भी ऐलान किया है कि पराली न जलाने वाले किसानों को 2500 रुपये प्रति एकड़ के दिए जाएंगे। लेकिन किसानों का कहना है कि सरकारें सिर्फ ऐलान करती हैं, उनको दिया कुछ नहीं जाता।

दूसरी तरफ जिले में अभी तक पराली जलाने के चार हजार से ज्यादा मामले सामने आ गए हैं, जिसमें से 500 के करीब किसानों को जुर्माना भी किया गया है। लेकिन इसमें अभी तक कोई रिकवरी नहीं हो पाई है। इसके अलावा किसानों को मिलने वाले लाभ भी रोकने के लिए उनकी जमीनों को रेड लाइन किया जा रहा है। जबकि पराली जलाने के कारण वीरवार को बठिडा का प्रदूषण स्तर 369 पर पहुंच गया है, जो खतरनाक कैटेगरी में हैं। इसके साथ सांस लेने में काफी परेशानी हो रही है। इससे पहले गत सप्ताह हुई बारिश के बाद यह प्रदूषण का स्तर भी 103 पर आ गया था। मगर प्रशासनिक अधिकारियों के गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व की तैयारियों में व्यस्त हो जाने के बाद किसानों ने धड़ाधड़ पराली को आग के हवाले कर दिया।

विजिबिलिटी कम होने से लोग परेशान

अक्टूबर पूरा ड्राई निकलने से मौसम पर इसका बहुत ज्यादा बुरा असर पड़ रहा है। वातावरण में पराली का धुआं मिक्स होने से नमी बढ़ने लगी है। इसके चलते शुक्रवार को धुआं लोगों के लिए परेशानी बना रहा। रात के समय तो विजिबिलिटी बहुत ही कम हो गई। इसके चलते लोग रात के समय सड़कों पर भटकते रहे तो मुख्य हाईवे सड़कों पर वाहन हादसों का शिकार होने लगे। जबकि पराली के धुंए से विजिबिलिटी कम होने कारण रेलवे स्टेशन पर ट्रेनें भी देरी से पहुंच रही हैं। वहीं दिन के समय ही वाहनों की लाइटों को जलाकर जाना पड़ रहा है। अस्पताल में बढ़ी मरीजों की गिनती

खेतों में जलाई जा रही पराली के कारण अस्थमा व सांस की बीमारियों के मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ है। इसके साथ गला खराब, एलर्जी, आंखों में जलन, सांस में घुटन जैसी कई प्रकार की परेशानियां लेकर मरीज सिविल अस्पताल पहुंच रहे है। पराली जलाए जाने से उठने वाला स्मॉग अभी भी छाया हुआ है। इसमें कार्बन मोनोआक्साइड, सल्फर डाइआक्साइड, कैडमियम, मर्करी, लेड व आर्सेनिक जैसे घातक प्रदूषक तत्व हैं, जो सांसों से हमारे शरीर में प्रवेश कर रहे हैं और कई तरह की बीमारियां फैला रहे हैं। यही कारण है कि अस्पताल में 15 से 30 फीसद तक मरीज बढ़ गए हैं। ओपीडी में दमा, एलर्जी, खांसी, जुकाम-बुखार, सांस फूलने, गले में खराश होने आदि के मरीज ज्यादा आ रहे हैं। डॉक्टरों के अनुसार बच्चे, बुजुर्ग व महिलाएं इससे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। ज्यादातर लोगों को एक जैसी समस्याएं ही सामने आ रही हैं। सांस व दिल के मरीजों की तकलीफ और भी ज्यादा बढ़ गई है। संस्थाओं ने लोगों को बांटे मॉस्क

आन से जुड़ी हुई संस्थाओं जीवन ज्योति वेलफेयर क्लब व नौजवान वेलफेयर सोसायटी की ओर से कीकर बाजार में लोगों को पराली के धुएं से बचाने के लिए मास्क बांटे गए। संस्थाओं के प्रधान सोनू महेश्वरी व संदीप अग्रवाल ने बताया कि इस समस्या पर प्रशासन खामोश है। इस मौके पर वीणा गर्ग, जीवा राम गोयल, रमेश ढंड, हसन बंसल सहयोग दे रहे हैं। चेहरे को ढककर बाहर

निकलें : डॉ. अग्रवाल

पराली के धुएं से कई प्रकार की बीमारियों से पीड़ित हो जाते है। अस्पताल में सांस, दमा, बुखार के मरीजों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। अस्थमा के रोगी व अन्य लोग अपने मुंह पर मास्क लगाकर रखें। बच्चों को दोपहर के बाद घर से बाहर खेलने के लिए ना भेजे व अगर बच्चे बाहर जाने की जिद्द करते है, तो उन्हें बाहर चश्मा लगा कर ही जाने दें। इसके अलावा पूरे शरीर को ढककर रखना चाहिए, जिसके साथ चमड़ी के रोगों से बचाव हो सकेगा। अगर हो सके तो मॉर्निंग व इवनिग वॉक से भी परहेज करें।

डॉ. जयंत अग्रवाल, एमडी मेडिसन प्रशासन कर रहा है कार्रवाई : डीसी जिला प्रशासन की ओर से पराली को आग लगाने वाले किसानों पर लगातार कार्रवाई की जा रही है। इसके लिए उन पर एफआईआर भी दर्ज की जा रही है। मगर फिर भी किसान पराली जलाने से बाज नहीं आ रहे हैं। लेकिन प्रशासन द्वारा पूरी कोशिश की जा रही है कि किसान पराली को आग न लगाएं।

बी श्रीनिवासन, डीसी, बठिडा

Posted By: Jagran

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