जागरण टीम, बठिडा : मौसम विभाग ने इस बार मानसून के समय पर आने की उम्मीद जताई है। इसके मद्देनजर ग्रामीणों क्षेत्रों में तो जिला प्रशासन और संबंधित विभागों की तैयारियां दिखाई दे रही हैं, लेकिन महानगर में इस तरह की कोई खास तैयारी नजर नहीं आ रही है। केवल शहर में नई राइजिग मेन डालने का काम अब दोबारा शुरू किया गया है। लेकिन इसके इस मानसून तक पूरा होने की उम्मीद नहीं है। बड़ी समस्या महानगर के पानी की बाहर निकासी की है, जोकि ज्यों की त्यों ही है। ग्रामीण क्षेत्रों में छप्पड़ों की सफाई पर जोर ग्रामीण क्षेत्रों में संबंधित विभाग नहरों व रजवाहों की सफाई करने में लग गए हैं। इसमें सबसे अहम गांवों में छप्पड़ों की सफाई को प्राथमिकता दी जा रही है। जिले में इस समय 650 छप्पड़ हैं। जिनकी पंचायती विभाग द्वारा मनरेगा व पंचायत के सहयोग से सफाई करवाई जा रही है। विभाग 10 जून से पहले इस कार्य को पूरा करवाने की कोशिश में है। इसका मुख्य कारण है कि 10 जून से धान की रोपाई शुरू हो जाएगी। जिसके बाद पंजाब की लेबर धान की रोपाई में लग जाएगी। इस बार धान की रोपाई के लिए दूसरे राज्यों की लेबर का पहुंचना मुश्किल है। इसे देखते हुए विभाग द्वारा काम करवाया जा रहा है। इसमें छप्पड़ों की डिसिल्टिंग, डीवाटरिग व रिपेयर की जा रही है। इसके अलावा बठिडा से निकलने वाली सरहिद नहर की ब्रांच में भी रिपेयर का काम किया जा चुका है।

डीडीपीओ हरजिदर सिंह जस्सल का कहना है कि पंचायती विभाग द्वारा कोशिश की जा रही है कि 10 जून से पहले सभी छप्पड़ों की सफाई की जाए। अगर कहीं कोई दिक्कत आई भी तो उसको बाद में पूरा कर लिया जाएगा। लेकिन हर काम को मानसून के आने से पहले पहले खत्म कर दिया जाएगा। 30 में से मात्र एक किलोमीटर मेन सीवरेज

लाइन की सफाई मानसून के दौरान शहर के निचले इलाकों का डूबना इस बार भी तय है। हर साल मानसून में शहर के इन इलाकों में पानी भरना और कई दिन तक न निकल पाना आम है। पानी की निकासी के लिए चार साल पहले शुरू हुआ 17 करोड़ रूपये का 1200 एमएम राइजिग मेन निर्माण का प्रोजेक्ट किसानों के साथ जमीन विवाद का निपटारा न कर पाने के कारण अभी तक अधर में हैं। इसमें साढ़े 12 किलोमीटर लंबी राइजिग मेन बननी है। पानी के एक मात्र स्त्रोत स्लज कैरियर भी खस्ता हाल में है। 40 साल पुराना यह स्लज कैरियर एक सीमित मात्रा में ही बरसाती पानी निकाल पा रहा है। पिछले कई सालों से प्रत्येक मानसून के दौरान टूट रहा है। बीते जनवरी माह में राज्य के वित्तमंत्री मनप्रीत सिंह बादल की ओर से इसकी मरम्मत के लिए करीब 80 लाख रूपये की ग्रांट भी उपलब्ध करवाई थी। लेकिन मरम्मत कार्य आज तक शुरू नहीं हो पाया। हर बार पानी भरने के बाद अगले मॉनसून से पहले पानी निकासी के पुख्ता इंतजाम करने के दावे और निर्देश किए जाते हैं, लेकिन व्यवस्था उसी ढर्रे पर चल रही है। पिछले मानसून में शहर के पानी में डूबने के बाद मुख्यमंत्री कार्यालय तक के अधिकारी यहां पर पहुंचे और भविष्य में पानी निकासी के स्थायी प्रबंध करने के कड़े निर्देश दिए, लेकिन एक साल बीतने के बाद भी कुछ नहीं बदला। न नया कुछ बना और न ही पुरानी व्यवस्था में कोई सुधार हुआ। केवल 11 किमी लेटरल सीवर की ही सफाई

शहर में मेन सीवरेज की लाइन की लंबाई 30 किलोमीटर है। जबकि 500 किलोमीटर की सब सीवर लाइनें हैं। लेकिन मेन सीवरेज लाइन में से अभी तक केवल एक किलोमीटर की ही मानसून के मद्देनजर सफाई हो पाई है। सीवरेज बोर्ड ने त्रिवेणी कंपनी को सब सीवरेज (लेटरल सीवर) लाइन की सफाई का 120 किलोमीटर का काम दिया है। उसमें से अभी तक करीब 11 किलोमीटर की ही सफाई हो पाई है। सीवरेज बोर्ड की ओर से कंपनी की काम की बकाया पेमेंट का भुगतान न किए जाने से केवल छोटी मशीनों के साथ ही सफाई की जा रही है। इसकी गति बड़ी सुपर सक्कर मशीनों के मुकाबले में काफी धीमी है। इस स्थिति के बावजूद सीवरेज बोर्ड के एक्सईएन अश्वनी कुमार का दावा है कि जहां-जहां सीवरेज लाइनों की सफाई की जरूरत है, वहां-वहां पर यह काम किया जा रहा है।

Posted By: Jagran

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