नितिन धीमान, अमृतसर : कोरोना वायरस का नाम सुनकर हृदय कांप उठता है, पर डर के आगे जीत है। यह जंडियाला गुरु के रहने वाले 24 वर्षीय साहिल ने साबित कर दिया। 36 दिन तक आइसोलेशन वार्ड में रहे साहिल ने धैर्य और दृढ़ता से कोरोना को परास्त किया। आमतौर पर कोरोना पॉजिटिव मरीज आइसोलेशन वार्ड में बड़ी मुश्किल भरा डर के साथ समय गुजारते हैं, लेकिन साहिल जिंदादिली से जिया। वह सुबह पूजा पाठ करता था और शाम को आइसोलेशन वार्ड में ही कसरत। वह शरीर को वॉर्मअप कर स्टेचिंग करता था। यह उसकी दिनचर्या थी। एक भी दिन उसने पाठ व एक्सरसाइज नहीं छोड़ी। परिणामस्वरूप कोरोना हार गया। बुधवार को गुरुनानक देव अस्पताल स्थित आइसोलेशन वार्ड से छुट्टी मिलने के बाद साहिल पर अस्पताल प्रशासन ने फूलों की वर्षा की।

पिछले साल ही स्टडी वीजा पर गया था यूके

पिछले वर्ष ही साहिल यूके में स्टडी वीजा पर गया था। वह यूके में टूरिज्म की डिग्री कर रहा था। अप्रैल में जब कोरोना का कहर बढ़ा, तो वह अमृतसर लौट आया। 19 मार्च को यूके से लौटे साहिल की एयरपोर्ट पर स्क्रीनिंग की गई थी। इस दौरान वह सामान्य पाया गया, लिहाजा उसे चौदह दिन तक घर में रहने की ताकीद कर भेज दिया गया। सात मई को उसे खांसी-जुकाम की शिकायत हुई। उसने इस बात की जानकारी स्वास्थ्य विभाग को दी। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग ने उसे आइसोलेशन वार्ड में दाखिल करवाया। उसके गले से स्वैब लेकर जांच के लिए मेडिकल कॉलेज स्थित इंफ्लुएंजा लैब भेज दिए। जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आई। ऐसे में साहिल के पिता, माता व बहन का भी सैंपल लिया गया, जिनकी रिपोर्ट निगेटिव थी।

कोरोना को दिमाग पर हावी नहीं होने दिया

साहिल के अनुसार यूके से आने के बाद मुझे कुछ नहीं हुआ था। सब कुछ सामान्य था। मैं चौदह दिन के लिए घर में क्वारंटाइन हो गया, लेकिन अचानक न जाने कैसे कोरोना वायरस अटैक कर गया। उस समय थोड़ी सी घबराहट हुई, लेकिन अपने मन-मस्तिष्क को समझाकर मैंने इस वायरस से लड़ने की ठान ली। फिर मेरे मन से घबराहट खत्म हो गई। सुबह परमात्मा का नाम लेकर अपने माता-पिता व बहन से मोबाइल पर बात कर था। शाम को आइसोलेशन वार्ड में ही कसरत करने लगता। इससे मैं तनाव मुक्त रहता था। मेरा दो बार कोविड-19 टेस्ट हुआ, पर दोनों ही बार मैं पॉजिटिव था। इससे भी मेरा मनोबल क्षीण नहीं हुआ। बुधवार को नर्सिंग सिस्टर ने बताया कि साहिल तुम कोरोना मुक्त हो गए हो। इसके बाद स्टाफ ने तालियां बजाई तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा।

पिता फोन पर कहते थे, 'पुत्त तू छेत्ती घर आजा'

आइसोलेशन वार्ड में मेरी पूरी केयर हुई। दवा व खाना समय पर मिलता था। घर से फलों का पैकेट पहुंच जाता। उपचार काल में मुझे कभी यह महसूस नहीं हुआ कि मैं यहां तन्हा हूं। पिता तलविदर सिंह फोन पर हमेशा कहते थे कि पुत्त तू छेत्ती घर आजा। आज घर पहुंचा तो सबकी आंखें खुशी से नम थीं। हालांकि, अभी परिवार से पूरी तरह मिल नहीं पाया, क्योंकि डॉक्टरों ने चौदह दिन तक अलग कमरे में रहने को कहा है। मैंने अपने दिमाग पर कभी कोरोना हावी नहीं होने दिया। यह वायरस खतरनाक है, लेकिन यदि इंसान डटकर इसका सामना करे, तो हम इसे हरा सकते हैं।

Posted By: Jagran

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