नितिन धीमान, अमृतसर

सूर्य की प्रचंड किरणें जहां धरा को झुलसा रही हैं, वहीं प्राणि मात्र भी बेचैन हैं। साल-दर-साल गर्मी में अप्रत्याशित ढंग से वृद्धि हो रही है। यह एक ऐसे भयानक खतरे का संकेत है, जो निकट भविष्य में बहुत पीड़ादायी होगा। तापमान में वृद्धि होने का बड़ा कारण हरे-भरे पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाना है, साथ ही इंसान ने अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए जलाशयों का अस्तित्व खत्म कर दिया। जलाशय जहां भूमिगत जल स्तर बरकरार रखने में अहम थे, वहीं सही समय पर वर्षा का स्त्रोत भी थे। इससे मौसम भी अनुकूल बना रहता था। आज शहर में तालाब, ताल-तलैया, पोखर दिखाई तो दे जाते हैं, लेकिन इनमें अतिक्रमण, जलकुंभी, झाड़ियां व सरकारी उपेक्षा की झलक दिखती है।

आज हम आपको गांव छोटा नौशहरा स्थित एक तलैया दिखा रहे हैं। किसी समय पानी से लबालब रहने वाला यह तलैया आज अपनी प्यास बुझाने में असमर्थ है। गांव में स्थित इस तलैया में कभी मेले लगा करते थे। बच्चे पूरा-पूरा दिन तलैया में अठखेलियां करते। पशु-पक्षी सब एक साथ जीवन रूपी तलैया में अपनी प्यास तृप्त करते थे। आज इस तलैया का अस्तित्व ही नहीं बचा, ऐसे में पशु-पक्षी और इंसान इसके आसपास भी नहीं फटकते।

असल में इस तलैया को लोगों ने ही कूड़े के ढेर में परिवर्तित कर दिया है। गांव में एक छोटा सा कारखाना है, जिसका अपशिष्ट इसी तलैया में फेंका जाता है। वहीं गांव के लोग भी इस तलैया को डंप के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। यह सब सिर्फ इसलिए क्योंकि लोगों को अब इस तलैया की जरूरत नहीं, सरकार और प्रशासन की बात तो छोड़ ही दीजिए। गांव के मुट्ठी भर लोग चाहते हैं यह तलैया पहले की तरह पुनर्जीवित हो।

गांव में इस तलैया का निर्माण कब और कैसे हुआ, इसके संदर्भ में गांववासियों के पास स्पष्ट जानकारी नहीं है। हां, कुछ बुजुर्ग बताते हैं कि तकरीबन 100 साल पहले से यह तलैया यहां विद्यमान हैं। तब गांव में दर्जन भर घर हुआ करते थे। तलैया का चमचम करता पानी सभी को अपनी ओर आकर्षित करता था। आसपास के गांवों के लोग भी यहां अठखेलियां करते थे। वो दौर ही कुछ और था। अब यह प्राकृतिक स्त्रोत वैसे ही सूख चुका है जैसे लोगों के दिलों से इक-दूजे के प्रति समर्पण भाव। जलाशयों को ¨जदा रखना जरूरी

सनी प्रीत ¨सह का कहना है कि देश के कई भागों में जल संकट गहरा गया है। शिमला जैसे जिले में भी रेड जोन वार्निंग जारी कर दी गई है। अमृतसर में ट्यूबवेलों के जरिए भूमिगत जल हमें मिल रहा है, लेकिन आने वाले वर्षों में हमें भी पानी के लिए संघर्ष करना पड़ सकता है। जल स्त्रोतों यानी कि जलाशयों को बचाने के लिए हमें आज से ही पहल करनी होगी। जलाशयों को साफ करवाया जाए, ताकि इनमें वर्षा का जल समाहित हो। यही जल वाष्पित होकर वर्षा के रूप में जमीन की प्यास बुझाता है। सरकार पर निर्भर रहने की बजाय लोग अपने स्तर पर ही जलाशयों की सफाई करें। पक्षियों का अस्तित्व हो रहा है खत्म

द¨वदर ¨सह ने कहा कि गांव के इस तलैया में कभी पक्षियों की चहचहाहट गूंजती थी। साल भर तलैया में पानी जमा रहता था। गांव में कभी सूखा नहीं पड़ा। बारिश भी समय पर होती रही। तलैया के चारों ओर मिट्टी में केंचुए वर्मी—कंपोस्ट तैयार करते थे, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति बरकरार रहती थी। अब यह तलैया संरक्षण के अभाव में सूख गया है और गंदगी के ढेर में परिवर्तित हो गया। पशु-पक्षियों का अस्तित्व तेजी से खत्म होने का कारण भी यही है कि हम जलाशयों को संभाल नहीं पा रहे। जनप्रतिनिधि और सरकारी अधिकारी इसे लेकर गंभीर नहीं। वो दिन दूर नहीं जब पानी की तलाश में हमें कई किलोमीटर तक भटकना पड़ेगा। तलैया से उठती है बदबू

व¨रदर पाल ¨सह ने कहा कि गांव के तलैया के पास जाने का ही मन नहीं करता। गंदगी के कारण तलैया से बदबू उठती है। हर साल गर्मी में पूरा देश जल संकट से जूझता है। इसका कारण यही है कि हमने जलाशयों को विस्मृत कर दिया। गर्मी में जीव-जंतुओं को ज्यादा पानी की जरूरत होती है। मनुष्य तो किसी तरह से पानी व धूप से बचने का इंतजाम कर लेता है, लेकिन बेजुबान जानवर बिन पानी कैसे ¨जएगे। पशु-पक्षियों के अलावा जल में रहने वाले जीवों का तो अब अस्तित्व ही मिटता जा रहा है।

Posted By: Jagran