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बेटी की आंखों में देखा अंधेरा, तो 600 लोगों की जिंदगी में भर दी रोशनी! अमृतसर के कृपा अरोड़ा की प्रेरणादायक कहानी

Published: Tue, 01 Sep 2026 05:48 PM (IST)

अपनी बेटी की आंखों की रोशनी लौटने के बाद कृपा अरोड़ा ने 2009 में नेत्रदान जागरूकता अभियान शुरू किया। उनके ...और पढ़ें

अपनी बेटी के साथ कृपा अरोड़ा।

अपनी बेटी के साथ कृपा अरोड़ा।

HighLights

  1. कृपा अरोड़ा ने बेटी की प्रेरणा से नेत्रदान अभियान शुरू किया

  2. उनके प्रयासों से 600 जरूरतमंदों को मिला नया जीवन

  3. मृत्यु के 6 घंटे के भीतर नेत्रदान करना है आवश्यक

नितिन धीमान, अमृतसर। किसी बेहद करीबी को आंखों की रोशनी खोते देखना कैसा दर्द होता है, यह अमृतसर के कृपा अरोड़ा ने खुद महसूस किया है। उनकी बेटी की कार्निया खराब होने के बाद परिवार को इलाज के साथ-साथ कार्निया मिलने का इंतजार भी करना पड़ा।

आखिरकार एक साल लंबे इंतजार के बाद लुधियाना के पुनर्जोत आई बैंक से कार्निया मिला और प्रत्यारोपण के बाद बेटी की आंखों में रोशनी लौट आई। बेटी की आंखों में लौटा उजाला परिवार के लिए राहत था, लेकिन इस पूरे अनुभव ने कृपा अरोड़ा के मन में एक सवाल छोड़ दिया कि जिन लोगों को समय पर कार्निया नहीं मिलता, उनका क्या होता होगा?

इसी सवाल और उस दर्द को उन्होंने अपने जीवन का मिशन बना लिया। वर्ष 2009 में उन्होंने नेत्रदान के लिए जागरूकता अभियान शुरू किया। लोगों को मृत्यु के बाद नेत्रदान के लिए प्रेरित करने का सिलसिला धीरे-धीरे अभियान में बदल गया। आज 86 वर्ष की उम्र में भी कटरा कर्म सिंह निवासी कृपा अरोड़ा इसी मुहिम में सक्रिय हैं।

उनके प्रयासों से अब तक करीब 600 जरूरतमंद लोगों के कार्निया प्रत्यारोपण में मदद मिल चुकी है। कृपा अरोड़ा बताते हैं कि बेटी के लिए कार्निया मिलने तक परिवार ने जिस बेचैनी को महसूस किया, उसने उन्हें समझाया कि किसी जरूरतमंद के लिए एक कार्निया कितनी बड़ी उम्मीद हो सकता है। बेटी की आंखों में रोशनी लौटने के बाद उन्होंने तय किया कि अब किसी दूसरे परिवार को इस इंतजार और बेबसी से न गुजरना पड़े, इसके लिए लोगों को नेत्रदान के प्रति जागरूक करेंगे।

मृत्यु के बाद छह घंटे में नेत्रदान जरूरी

कृपा अरोड़ा के अनुसार मृत्यु के बाद छह घंटे के भीतर नेत्रदान किया जाना चाहिए। मृत्यु के बाद स्वजनों को मृतक की पलकें बंद कर देनी चाहिए और आंखों पर ठंडी पट्टी या बर्फ रखकर जल्द से जल्द नेत्रदान केंद्र या संबंधित टीम को सूचना देनी चाहिए। चश्मा पहनने वाले, आंखों की सर्जरी करा चुके या लेंस लगवा चुके लोग भी नेत्रदान कर सकते हैं। उच्च रक्तचाप और मधुमेह से पीड़ित व्यक्ति भी नेत्रदान कर सकते हैं।

परिवार को पहले बताएं अपना संकल्प

कृपा अरोड़ा कहते हैं कि नेत्रदान का संकल्प लेने के साथ परिवार को इसकी जानकारी देना भी जरूरी है। मृत्यु के बाद स्वजन ही संबंधित टीम को समय पर सूचना दे सकते हैं। उनका संदेश है कि इंसान के जाने के बाद उसकी आंखें किसी दूसरे के जीवन में उजाला बन सकती हैं। इसलिए मृत्यु अंत नहीं, किसी जरूरतमंद के लिए नई रोशनी की शुरुआत भी हो सकती है।