नितिन धीमान, अमृतसर

किडनी फैल्योर शिकार मरीजों से सिविल अस्पताल में खिलवाड़ हो रहा है। दो माह से अस्पताल में डायलिसिस सेवा बंद होने के कारण तकरीबन 100 मरीजों की ¨जदगी जोखिम में पड़ गई है। सरकारी अधिकारियों का सरकारी आश्वासन किडनी रोग से पीड़ित मरीजों के दर्द पर सिर्फ संवेदना का मरहम लगा रहा है। मरीजों को बार-बार यही कहा जा रहा है कि दस-पंद्रह दिन में डायलिसिस सेवा शुरू हो जाएगी। वास्तविक स्थिति यह है कि डायलिसिस सेवा किडनी की तरह ही फेल हो चुकी है और मरीज मृत्युशैया के नजदीक पहुंच गए हैं।

दरअसल, किसी समय उत्कृष्ट स्वास्थ्य सेवाएं देने के नाम पर सिविल अस्पताल को प्रदेश का नंबर वन अस्पताल घोषित किया गया था। इस नंबर वन अस्पताल में दो माह से डायलिसिस सेवा बंद है। बुधवार को किडनी फैल्योर का शिकार दस मरीज व उनके परिजन सिविल सर्जन डॉ. हरदीप ¨सह घई से मिले। मरीजों ने गुहार लगाई कि वे मौत के मुहाने तक पहुंच चुके हैं। यदि जल्द ही डायलिसिस सेवा शुरू न की तो उनकी सांसें थम जाएंगी।

साधना निवासी बटाला रोड ने सिविल सर्जन से कहा कि मेरे पति शिवाराम पिछले दो साल से किडनी की बीमारी से जूझ रहे हैं। सिविल अस्पताल में डायलिसिस करवाती रही, पर अब यहां डॉक्टर न होने के कारण यह सेवा बंद है। साधना ने कहा कि हमें सिविल अस्पताल से गुरुनानक देव अस्पताल भेजा गया था। यहां बताया गया कि डायलिसिस फ्री नहीं होगा। डायलिसिस के लिए प्रयुक्त होने वाली आठ सौ रुपये की किट खरीदकर लानी होगी। हमारे पास सिर्फ तन ढकने को कपड़े हैं, जेब में पैसा नहीं।

आखिरी सांसें बची हैं

साठ वर्षीय निर्मल ¨सह आखिरी सांसें गिन रहे हैं। निर्मल ¨सह सिर्फ इसलिए सिविल सर्जन कार्यालय आए ताकि वरिष्ठ अधिकारी को अपनी पीड़ा का अहसास करवा सकें। ऑटो पर बैठ कर निर्मल ¨सह के साथ विशाल, शिवाराम, प्रमोद, स¨तदर कौर आदि मरीज सिविल सर्जन कार्यालय पहुंचे। सभी ने अपनी पीड़ा अधिकारी को बताई और कहा कि हर सप्ताह डायलिसिस करवाना पड़ता है। अब जेब खाली है इसलिए डायलिसिस नहीं करवा पास रहे। ज्यादातर मरीज ऐसे हैं जिनके घर में आटा—चावल तक नहीं। उधार मांगकर निजी डायलिसिस सेंटरों में डायलिसिस करवा रहे हैं। सात दिन पहले सिविल सर्जन ने दिया आश्वासन, फिर मिला भरोसा

पिछले सप्ताह भी इन मरीजों व उनके परिजनों को सिविल सर्जन डॉ. हरदीप ¨सह घई एक सप्ताह के भीतर मेडिसिन डॉक्टर की व्यवस्था करने की बात कही थी। एक सप्ताह बीतने के बाद बुधवार को ये परिवार पुन: डॉ. घई से मिले। इस बार डॉ. घई ने पंद्रह दिन में व्यवस्था दुरुस्त करने की बात कही। हम अपने रिस्क पर करवा लेंगे डायलिसिस

उक्त परिवारों ने सिविल सर्जन से कहा कि मेडिसिन डॉक्टर का काम केवल इतना था कि वह डायलिसिस करवाने आए मरीज की फाइल पर साइन करता था। इसका मतलब यह था कि मरीज को डायलिसिस करवाने की अनुमति दी जाती है। डॉक्टर के हस्ताक्षर होने के बाद डायलिसिस यूनिट का स्टाफ डायलिसिस करता था। अब जबकि डॉक्टर नहीं है तो हम यह लिखकर देने को तैयार हैं कि यदि डायलिसिस के दौरान कोई अनहोनी होती है तो इसके लिए स्टाफ कसूरवार नहीं होगा। हालांकि मरीजों के परिजनों के इस तर्क पर सिविल सर्जन से साफ कहा कि नियमानुसार ऐसा संभव नहीं। तीन मेडिसिन डॉक्टरों को सिविल अस्पताल से किया विदा

स्वास्थ्य विभाग की कारगुजारी का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि सिविल अस्पताल में दो माह पूर्व तीन मेडिसिन डॉक्टर थे। विभाग ने दो मेडिसिन डॉक्टर को सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीनियर रेजिडेंसी के लिए भेज दिया, जबकि तीसरे को गुरदासपुर ट्रांसफर कर दिया गया। बस तभी से किडनी फैल्योर मरीजों की सांसें थमी हुई हैं।

Posted By: Jagran