जेएनएन, अमृतसर। इंग्लैंड के कैंटरबरी के आर्कबिशप जस्टिन वेल्बी ने जलियांवाला बाग में पहुंचकर शहीदी स्मारक पर चिलचिलाती धूप में तपते पत्थर पर दो बार पेट के बल लेटकर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके अलावा यहां हुए नरसंहार के लिए प्रायश्चित किया।

जस्टिन वेल्बी ने कहा कि आज से ठीक 100 साल पहले जलियांवाला बाग में जो क्रूरता हुई थी, उसके लिए वह बेहद दुखी हैं। जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार में हुए शहीदों के परिजनों के साथ उनकी दुआएं हमेशा साथ रहेंगी। वे उम्मीद करते हैं कि जलियांवाला बाग की तरह मानवीय क्रूरता को दोहराया न जाए। उन्होंने कहा कि वह किसी सरकार की तरफ से नहीं बल्कि एक धार्मिक नेता होने के नाते अमृतसर आए हैं।

जलियांवाला बाग की विजिटर बुक में उन्होंने लिखा है कि नरसंहार में शहीद हुए लोगों को बच्चों के लिए भी वह विशेष प्रार्थना करते हैं। भारत के साथ-साथ अमृतसर में रहने वाले लोगों की प्रशंसा की और कहा कि वह जलियांवाला बाग में प्रायश्चित करने के लिए आए हैं, क्योंकि कैंटरबरी में इसे प्रायश्चित कहते हैं। इसके बाद वह श्री दरबार साहिब में पहुंचे, जहां दर्शन करने के बाद उन्होंने श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार सिंह साहिब ज्ञानी हरप्रीत सिंह से मुलाकात की।

उन्होंने कहा कि सिख कौम बहुत ही गर्म जोशी से समाज की सेवा व शांति के लिए प्रयासरत है, जिसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए, उतनी ही कम है। उन्होंने कहा कि उनका खुद का मकसद भी यही है विश्व में अमन-शांति का माहौल बने, जिसका वह संदेश लेकर आए हैं। इस मौके पर उनकी धर्मपत्नी कैरोलीन वेल्बी, एलिशा जेन, डॉ. रेवरेंड विलियम जोनाथान व अन्य मौजूद थे।

टेरेसा ने माफी नहीं मांगी, खेद जताया था

जलियांवाला बाग नरसंहार की 100वीं बरसी पर ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री टेरेसा मे ने अफसोस जता इसे ब्रिटेन-भारत इतिहास का शर्मनाक धब्बा बताया था। हाउस ऑफ कॉमन्स यानी ब्रिटेन संसद में दिए भाषण के बाद उन्होंने लंदन में डाउनिंग स्ट्रीट पर आयोजित एक कार्यक्रम में भी अफसोस जताया था। कहा था, 'जो हुआ हमें उस पर गहरा खेद है और इतने सारे लोगों को दर्द से गुजरना पड़ा। उस दिन जो हुआ था उसका विवरण सुनने के बाद कोई भी ऐसा नहीं होगा जो अंदर तक हिल न जाए. कोई भी सच में ये नहीं सोच सकता कि 100 साल पहले उस दिन इस बाग में आने वालों पर क्या गुजरी होगी।'

क्या हुआ था सौ साल पहले

अमृतसर के जलियांवाला बाग में रॉलेट एक्ट का विरोध कर रहे हजारों निहत्थे भारतीयों पर अंग्रेजों ने अंधाधुंध गोलियां चलाई थी। 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी वाले दिन हुई इस हत्याकांड में 800-1000 तक लोग मारे गए थे। जनरल डायर के आदेश पर चलाई गोलियों के कारण कई लोगों ने जान बचाने के लिए कुएं में ही छलांग लगा दी थी।

आपसी संबंधों में सुधार की पहल: फादर पीटर

जस्टिन वेल्बी के प्रायश्चित का क्रिश्चियन समुदाय ने स्वागत किया है। बिशप हाउस सिविल लाइंस के फादर पीटर ने कहा कि दोनों देशों के आपसी संबंधों में बेहतर माहौल कायम करने में यह प्रयास मील का पत्थर साबित होगा। अब आपसी मनमुटाव को दूर करके बेहतर माहौल कायम करने की जरूरत है। इसमें इंग्लैंड के प्रतिनिधि ने पहल की है। किसी भी हालात में इंसान की जान का चले जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसे में इस घटना पर अफसोस जाहिर करना या ङ्क्षनदा करना किसी भी नागरिक की नैतिक जिम्मेदारी है। इस पहल से दोनों देशों में निश्चित रूप से सकारात्मक माहौल बनेगा।

व्यक्तिगत तौर पर निंदा करते हैं, आधिकारिक तौर पर स्वीकार नहीं किया: बहल

जलियांवाला बाग शहीद परिवार समिति के प्रधान महेश बहल ने कहा कि 13 अप्रैल 1919 को ब्रिटिश साम्राज्य की ओर से जलियांवाला बाग में किया गया नरसंहार निश्चित रूप से बर्बरतापूर्ण कृत्य था। यह सभी मानते भी हैं और व्यक्तिगत रूप से इसकी निंदा भी करते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि आज तक खुले दिल से किसी ने भी अधिकारिक तौर पर इसे स्वीकार नहीं किया है।

बिशप वेल्बी ब्रिटिश गवर्नमेंट के अधिकारी नहीं: बिशप समंता

डायसिस ऑफ अमृतसर के चर्च ऑफ नॉर्थ (सीएनआइ) के बिशप पीके समंता राय का कहना है कि आर्कबिशप जस्टिन वेल्बी एक धार्मिक नेता हैं और सरकारों का कोई धर्म नहीं होता है। उनका कहना है कि भारत में आए आर्कबिशप बिशप वेल्बी के शिष्टमंडल का निजी दौरा था, जिसे किसी भी दूसरे तथ्य के साथ नहीं जोडऩा चाहिए। उनके मुताबिक आर्कबिशप बिशप वेल्बी का कहना है कि ब्रिटिश सरकार की तरफ से बोलना उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है, क्योंकि वह ब्रिटिश गवर्नमेंट के कोई अधिकारी या राजनीतिक नेता नहीं हैं। 

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Posted By: Kamlesh Bhatt

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