नितिन धीमान, अमृतसर : सरकारी मेडिकल कॉलेज स्थित गायनी यूनिट नंबर 3 की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. बलविदर कौर ने पद से त्यागपत्र दे दिया है। मेडिकल शिक्षा एवं खोज विभाग ने उनका त्यागपत्र स्वीकृत भी कर लिया गया है। रीढ़ की हड्डी में दर्द की तकलीफ से जूझ रही डॉ. बलविदर कौर मेडिकल लीव चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने मेडिकल कॉलेज प्रशासन को सूचित भी किया, मगर प्रशासन ने इस बात की जांच के लिए मेडिकल बोर्ड का गठन कर दिया कि क्या वाकई डॉ. बलविदर कौर को रीढ़ में दर्द की शिकायत है। इस बात से आहत डॉ. बलविदर ने इस्तीफा देकर खुद को सरकारी स्वास्थ्य सेवा से अलग कर लिया है।

दरअसल, काम के दबाव व बिगड़ी व्यवस्था के कारण मेडिकल कॉलेज के कई डॉक्टर पूर्व में भी सरकारी नौकरी को गुडबाय कर चुके हैं। ऐसे में यहां डॉक्टरों की कमी आड़े आ रही है। डॉ. बलविदर कौर ने कहा कि उन्होंने 26 साल तक स्वास्थ्य विभाग एवं मेडिकल शिक्षा एवं खोज विभाग में ईमानदारी से सेवा निभाई है। मैं पिछले दो माह से रीढ़ की तकलीफ से जूझ रही हूं। बीच-बीच में मेडिकल लीव लेकर ट्रीटमेंट करवाती रही और मेडिकल कॉलेज भी आती रही। यहां खड़े रहकर डिलीवरी की प्रक्रिया करने से उन्हें फिर से दर्द उठने लगता। इसलिए मैंने कॉलेज प्रशासन से तीन माह की मेडिकल लीव मांगी, ताकि तरीके से उपचार करवा सकूं। कॉलेज प्रशासन ने छुट्टी देने की बजाय मेडिकल बोर्ड बना दिया। यह जानने के लिए कि कहीं मैं झूठ तो नहीं बोल रही। मैं वाकई रीढ़ के दर्द से जूझ रही हूं। 26 साल के करियर में कभी बेवजह अवकाश नहीं लिया। यह बात मेरे लिए ठेस पहुंचाने एवं बेइज्जत करने जैसा था। इसलिए मैंने नौकरी को अलविदा कह दिया।

डॉ. बलविदर के अनुसार उन्होंने काम को कभी बोझ नहीं समझा। ऑन कॉल भी ड्यूटी पर आती रहीं। वह गायनी यूनिट नंबर 3 में कार्यरत थीं। मेरे यूनिट में सीनियर रेजिडेंस डॉक्टर नहीं दिए जाते। उनका काम भी असिस्टेंट प्रोफेसरों को करने के लिए कहा जाता। यूनिट नंबर 1 और 2 में सीनियर रेजिडेंट और जूनियर रेजिडेंट्स डॉक्टर जरूरत से ज्यादा रखे गए हैं। मैं डॉक्टर की मांग करती तो कहा जाता कि इनकी ड्यूटी आप खुद कर लो।

कुछ माह पूर्व गायनी विभाग में कार्यरत सीनियर रेजिडेंस डॉक्टर उन्नति का एक्सीडेंट हुआ था। उसने मेडिकल लीव अप्लाई किया, पर कॉलेज प्रशासन ने मेडिकल बोर्ड बना दिया। ऐसे में डॉ. उन्नति भी नौकरी छोड़कर चली गई। इसी प्रकार सीनियर रेजिडेंट्स डॉ. हरनवनीत, डॉ. तूलिका, डॉ. सिमरन ने भी नौकरी को बाय-बाय कर दिया। यहां तनाव मिल रहा है। ऐसे माहौल में काम करना मुश्किल था। सीनियर रेजिडेंस, पीजी, जूनियर रेजिडेंट्स से तीस तीस घंटे काम लिया जा रहा है। ये भी तो इंसान हैं। तनाव में काम करते हैं और मरीज इन पर आरोप लगाते हैं कि डॉक्टर दु‌र्व्यवहार करते हैं। ऐसी व्यवस्था में मैंने तो रिजाइन कर दिया है। मुझे शारीरिक समस्या थी, पर कॉलेज प्रशासन ने सहयोग नहीं किया। इस आयु में और बीमारी की सूरत में काम नहीं कर पा रही थी। अब मैंने खुद को सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं से अलग कर लिया है।

Posted By: Jagran

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