जागरण टीम, अमृतसर : पराली संभाल को लेकर पंजाब सरकार अभी तक कोई ठोस नीति नहीं बना सकी। सिर्फ जागरूकता ही पंजाब में पराली को आग लगाने के लिए काफी नहीं। किसानों को गेहूं और धान के अलावा अन्य उत्पादों की भी एमएसपी (मिनीमम सेल प्राइस) निर्धारित करनी चाहिए। क्योंकि किसान वित्तीय नुकसान के भय से ही पराली को खेत में जला देते हैं। वहीं पंजाब में कार्ड बोर्ड उद्योग (गत्ता) को प्रमोट करना ही इसका स्थाई हल है और पराली को आग लगाने से हमेशा से लिए बचा जा सकता है। खेत में पराली नहीं जलाने वाले किसान को सरकार की ओर से धान और गेहूं की खरीद पर कुछ अतिरिक्त वित्तिय लाभ दिया जा सकता है। यह विचार वार्प निटिंग उद्योग एसोसिएशन और कार्ड बोर्ड उद्योगपतियों ने दैनिक जागरण की ओर से पराली संभाल विषय पर रंजीत ऐवेन्यू दैनिक जागरण के कार्यालय में आयोजित राउंड टेबल कांफ्रेंस के दौरान रखे। सभी ने दैनिक जागरण ग्रुप के पराली नहीं जलाएंगे, पर्यावरण बचाएंगे अभियान की सराहना की।

पराली जलाना किसान की मजबूरी, सरकार बनाए ठोस नीति

द पंजाब वार्प निटिग एसोसिएशन के प्रधान संजय मेहरा टीनू ने कहा कि पराली को आग लगाने का चलन कुछ साल पहले ही शुरु हुआ है। सरकार को चाहिए कि इसके पीछे कारणों का पता लगा पराली संभाल के लिए ठोस नीति बनाए। किसान पराली को आग नहीं लगाना चाहता मगर यह उसकी मजबूरी बनने लगा है। इसमें मजदूरी भी एक फेक्टर है। बहुत मजदूर होने पर किसान पराली कटवा देता था मगर अब उसके लिए ऐसा करना संभव नहीं।

सरकार खेतों से पराली उठवाने की करे व्यवस्था

कार्डबोर्ड उद्योग से जुड़े व रोटरी क्लब आस्था के प्रधान परमजीत सिंह ने कहा कि पराली संभाल को लेकर एकमात्र हल है राज्य में कार्डबोर्ड के उद्योग शुरू करना। पहले छोटे पावर प्लांट में पराली इंधन के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था, जो अब बंद हो चुके हैं। पंजाब सरकार को ऐसे पावर प्लांट को दोबारा से शुरू करना चाहिए और धान और गेहूं की कटाई के सीजन में पराली को उठवाने की मुफ्त व्यवस्था भी। किसान को यह समझना होगा कि पराली को आग लगाने का असर उसके घर से दूर शहरों में बैठे लोगों को ही नहीं बल्कि उसके परिवार पर भी इसका असर होता है। मटर की फसल के लिए लगाते हैं किसान पराली को आग

पेडी उद्योग से जुड़े जतिंदर सिंह व रोटरी क्लब के पूर्व प्रधान जतिदर सिंह ने कहा कि किसान को गेहूं और धान के अलावा किसी अन्य फसल के लिए एमएसपी नहीं मिलती। इसलिए किसान कटाई के तुरंत बाद अन्य फसल जैसे मटर बीजना चाहता है। पराली को आग लगाने का सबसे बड़ा यही कारण है। गेहूं तथा धान के साथ अन्य खेती उत्पादों की भी सरकार को एमएसपी निर्धारित करनी चाहिए। किसान 15-20 साल पहले कटाई के बाद पराली को तूड़ी में बदल पशुओं के लिए चारा बनाते थे, लेकिन आज किसान के पास उसे स्टोर करने के लिए जगह नहीं और उसे पराली को आग लगाना आसान लगता है।

दवाओं की बजाए इसके सोर्स पर ही किया जाए खर्च

निटिग उद्योग से जुड़े वरुण खन्ना कहते हैं कि सरकारें पराली को आग लगाने से पैदा हुए धुएं से पनपी बीमारियों पर लाखों रुपये दवाओं के रूप में खर्च करती है। सरकार को चाहिए कि दवाओं पर पैसा खर्च करने की बजाए उसके सोर्स (पराली) को ही खरीद लें। सरकार जब पराली खरीदना शुरु करेगी तो किसान को भी वित्तीय लाभ होगा और वह पराली को आग लगाने की बजाए खेत के किनारे पर संभाल कर रखेगा। पराली बेस्ड उद्योग के लिए सरकार बनाए नीति

जीएसपी प्रेक्टीशनर्ज एसोसिएशन के पूर्व प्रधान नवीन सहगल कहते हैं कि पंजाब सरकार पराली बेस्ड उद्योग लगाए जाने की नीति बनाए। डॉक्टरों और खेतीबाड़ी विशेषज्ञों की संयुक्त टीम गांव-गांव दौरा कर लोगों को पराली से उठने वाले धुएं से होने बीमारियों सांस और अस्थमा आदि प्रति जागरूक किया जाए। नुक्कड़ नाटकों की सीडी तैयार करवा गांवों के स्कूलों और पंचायतों में दिखाई जाए। क्योंकि बताई गई बातों के मुकाबले देखी गई चीज का इंसान के दिमाग पर ज्यादा असर होता है। इसके लिए सरकारों के साथ-साथ आम लोगों को भी आगे आना चाहिए।

Posted By: Jagran

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