नितिन धीमान, अमृतसर: सिविल अस्पताल में धारा-326 की फर्जी रिपोर्ट तैयार करने वालों के खिलाफ अस्पताल प्रशासन ने सख्त कदम उठाया है। पिछले एक माह में इस अस्पताल में डाक्टरों की ओर से तैयार की गई 326 की 21 रिपो‌र्ट्स रद की गई हैं। इन रिपो‌र्ट्स के संदर्भ में संबंधित थाने की पुलिस को भी जानकारी दी गई है। दूसरी तरफ सिविल अस्पताल के कुछ कर्मचारी ऐसे केसों में छब्बी बनाने या न बनाने के नाम पर वादी एवं प्रतिवादी पक्ष से पैसों का लेनदेन करते हैं। ऐसे में अब इन कर्मियों और लोगों की खैर नहीं।

कई बार शहर में यह बात चर्चा का विषय भी रही कि पैसे देकर हमने छब्बी बनवा ली या पैसे देकर छब्बी तुड़वा ली। इस वजह से अस्पताल की प्रतिष्ठा धूमिल हो रही थी। ऐसे में सिविल अस्पताल के दोनों एसएमओ डा. चंद्रमोहन और डा. राजू चौहान ने पिछले एक माह में तैयार मेडिको लीगल रिपो‌र्ट्स की बाकायदा जांच की। 50 से अधिक रिपो‌र्ट्स की जांच में 21 रिपोर्ट की प्रमाणिकता पर संदेह हुआ। हालांकि अस्पताल प्रशासन ने यह स्पष्ट नहीं किया कि ये रिपो‌र्ट्स किन डाक्टरों या कर्मचारियों ने तैयार की और इनमें किस प्रकार वादी अथवा प्रतिवादी को लाभ पहुंचाने का प्रयास किया गया, पर यह जरूर कहा कि जिसने भी तैयार की हैं उसे पता है। जिन्होंने छब्बी के नाम पर पैसे लिए हैं, वे ठिठक गए हैं। अब से दोनों एसएमओ करेंगे रिपोर्ट की समीक्षा

एसएमओ डा. राजू चौहान ने कहा कि ये 21 रिपोर्ट संदेहास्पद थीं। फिलहाल इन्हें रद कर संबंधित थानों में भेजा गया है। अब इनका पुन: रिव्यू कर रिपोर्ट तैयार की जाएगी। भविष्य में छब्बी के नाम पर गलत रिपोर्ट न बने और पैसे की वसूली न हो, इसके लिए दोनों एसएमओ एक-एक रिपोर्ट की समीक्षा करेंगे। उदाहरण के तौर पर लड़ाई झगड़ों के केस में स्पेशलिस्ट डाक्टर व दो फोरेंसिक एक्सपर्ट जांच के बाद रिपोर्ट तैयार करेंगे। इसके बाद दोनों एसएमओ के साथ बैठक कर इस रिपोर्ट का बारीकी से अध्ययन करेंगे। यह देखा जाएगा कि किसी पक्ष विशेष को लाभ पहुंचाने के लिए तो छब्बी नहीं लगा दी गई। धारा 326 के तहत दोषी पाए जाने पर सात साल की सजा का प्रावधान

दरअसल, भारतीय दंड संहिता की धारा-326 उस स्थिति में आरोपित पर लगाई जाती है जब उसने किसी व्यक्ति को बुरी तरह पीटा हो जिससे कि व्यक्ति के गहरा कट लगा हो या फिर दांत टूटे हो। ऐसे मामलों में आरोपित को सात वर्ष की सजा का प्रावधान है। घायल व्यक्ति का सिविल अस्पताल से मेडिकल लीगल टेस्ट करवाया जाता है। इसमें सिर से लेकर पैर तक आईं चोटों का आकलन किया जाता है। एक्सरे, जरूरत पड़ने पर एमआरआइ, सीटी स्केन व अल्ट्रासाउंड तक करवाया जा सकता है। कर्मचारियों के पास हैं हड्डीतोड़ लोग

सिविल अस्पताल के कुछ कर्मचारियों के संपर्क में हड्डी तोड़ लोग हैं। यदि किसी शख्स ने किसी को जख्मी कर दिया है और धारा छब्बी से बचना चाहता है तो ये कर्मचारी उसे हड्डी तोड़ लोगों के पास भेज देते हैं। जिसे चोट लगी है वह तो अस्पताल में है, जबकि जो ठीक ठाक है वह इन लोगों से हड्डी तुड़वाकर अस्पताल में पहुंच जाता है और इसका ठीकरा दूसरे पक्ष पर फोड़ता है। पहले ऐसी थी प्रक्रिया

पूर्व में मेडिको लीगल केस स्पेशलिस्ट व फोरेंसिक डाक्टर ही डील करते थे। वह रिपोर्ट तैयार कर क्लर्क के पास भेजते थे और क्लर्क इसे आनलाइन कर संबंधित थानों को भेज देता था। एसएमओ का इस प्रक्रिया से कोई लेना देना नहीं था।

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