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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Dec 29, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

दीवान टोडरमल की निष्ठा अनूठी मिसाल : कोछड़

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Published: Mon, 29 Dec 2014 01:00 AM (IST)Updated: Mon, 29 Dec 2014 04:38 AM (IST)

जागरण संवाददाता, अमृतसर : इतिहास में जब भी दशमेश पिता गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों जोरा

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जागरण संवाददाता, अमृतसर :

इतिहास में जब भी दशमेश पिता गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों जोरावर सिंह जी तथा फतह सिंह जी की शहादत की चर्चा होगी तो भाई मोतीराम मेहरा की शहादत तथा दीवान टोडरमल की गुरु घर के प्रति निष्ठा तथा समर्पण का जिक्र किए बगैर इतिहास आगे नहीं बढ़ेगा। छोटे साहिबजादों के शहीदी दिवस के बारे में जानकारी देते हुए इतिहासकार एवं शोधकर्ता सुरेंद्र कोछड़ ने पत्रकारों को बताया कि जब गुरु परिवार पर आई संकट और विपदा की घड़ी में मुगलों के डर से हर कोई गुरु परिवार का साथ देने से पीछे हट रहा था तो उस समय भाई मोती राम मेहरा तथा दीवान टोडर मल ने अपना फर्ज निभाते हुए गुरु साहिब के प्रति जो वफादारी दिखाई, उसने उन्हें सिख इतिहास में सदा-सदा के लिए अमर कर दिया।

कोछड़ के अनुसार गुरु साहिब के परिवार के आनंदपुर साहिब त्यागने के बाद सरसा नदी के किनारे आपस में बिछुड़ जाने पर माता गुजरी जी व छोटे साहिबजादों को वहा से गुरु घर का चाकर गंगू मोरिंडा के पास अपने गाव खेड़ी ले गया। वहा पहुंचने पर गंगू ने माता जी के तकिए के नीचे रखी पैसों और जेवरों की थैली चोरी करने के पश्चात सरकार से मिलने वाले इनाम के लालच में गुरु परिवार के उसके घर में होने की खबर मोरिंडा के हाकम के पास पहुंचा दी। इसके चलते माता जी तथा साहिबजादों को बंदी बना कर सरहिंद के नवाब वजीर खा की कचहरी में पेश किया गया। फिर नवाब ने कड़कती सर्दी में वृद्ध माता जी तथा साहिबजादों को ठंडे बुर्ज में कैद करने का हुक्म सुना दिया।

कोछड़ के अनुसार भाई मोती राम मेहरा जिन्हें सरहिंद के नवाब द्वारा हिंदू कैदियों को भोजन कराने के लिए नियुक्त किया गया था, उन्हें जब माता जी तथा साहिबजादों के ठंडे बुर्ज में कैद होने की खबर मिली तो वह कोरे बर्तन में गर्म दूध भरकर ठंडे बुर्ज में पहुंच गया। उन्हें पता था कि बुर्ज के पहरेदार गर्म दूध का बर्तन किसी भी सूरत में बुर्ज के अंदर नहीं पहुंचने देंगे, इसलिए वह जाते समय पहरेदारों को रिश्वत देने के लिए अपनी पत्नी तथा मा के जेवर तथा कुछ पैसे साथ ले गया। मोती राम मेहरा लगातार तीन रात तक पहरेदारों को रिश्वत देकर माता जी तथा साहिबजादों को गर्म दूध पिलाने के लिए ठंडे बुर्ज में जाते रहे। बाद में जब नवाब को इस बात की जानकारी मिली तो उसने हुक्म जारी करके मोती राम मेहरा तथा उसकी वृद्ध मा, पत्नी व इकलौते पुत्र को कोहलू में डालकर कर शहीद कर दिया।

उन्होंने बताया कि जब साहिबजादों को जिंदा दीवार में चिनवाने के बाद बेरहमी से शहीद करके माता गुजरी जी के पार्थिव शरीर सहित मौजूदा गुरुद्वारा फतहगढ़ साहिब के पीछे जंगल में रखा गया। इसी क्षेत्र के धनी तथा मुगल दरबार के कर्मचारी दीवान टोडरमल ने नवाब से पार्थिव शरीर लेकर उनका अंतिम संस्कार करने की अनुमति मागी। इस पर नवाब द्वारा रखी शर्त के अनुसार संस्कार के लिए स्वर्ण मोहरें बिछा कर भूमि प्राप्त की। गुरु परिवार के प्रति इस वफादारी के बदले बाद में नवाब सरहिंद ने दीवान टोडरमल की हवेली तथा उनकी शेष संपत्ति नष्ट करवा दी।

कोछड़ ने कहा कि भाई मोती राम मेहरा तथा उनके परिवार की शहादत और दीवान टोडर मल जी की गुरु घर के प्रति निष्ठा तथा समर्पण अपने आप में एक अनूठी मिसाल है, जिस के चलते उनका नाम सिख इतिहास में हमेशा सम्मान तथा सत्कार से लिया जाता रहेगा।