नरेन्द्र शर्मा, जयपुर। Vasundhara Raje: 32 दिन बाद कांग्रेस के सियासी संग्राम का अंत हो गया। अब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच विवाद खत्म कराने में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी व महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कुछ कदम पायलट ने पीछे खींचे तो गहलोत ने भी अपना रुख नरम किया। प्रदेश के सियासी गलियारों में पायलट की वापसी के पीछे कई मतलब निकाले जा रहे हैं। कांग्रेस के भीतर नेताओं का मानना है कि पायलट खेमे के विधायक 14 तारीख से शुरू हो रहे विधानसभा सत्र से पहले कोई हल निकालने को लेकर लगातार उन पर दबाव बना रहे थे। वहीं, कुछ नेताओं का मानना है कि पायलट की कांग्रेस में वापसी का एक कारण पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और उनके समर्थक विधायक भी रहे।

पांच दिन से दिल्ली में डेरा डाले बैठीं वसुंधरा राजे ने पार्टी के प्रदेश नेतृत्व द्वारा पायलट खेमे को हवा देने के निर्णय का विरोध किया। इन नेताओं का कहना है कि पायलट विवाद के बाद अगर वसुंधरा राजे सक्रिय होतीं तो गहलोत सरकार को गिराया जा सकता था, लेकिन वसुंधरा राजे ने चुप्पी साधे रखी। यह तय था कि प्रदेश में भाजपा की सरकार बनती तो भी मुख्यमंत्री का ताज वसुंधरा राजे के सिर पर नहीं सजना था। इसलिए वे पूरे घटनाक्रम के दौरान शांत रहीं। केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया व विपक्ष के नेता गुलाब चंद कटारिया की जोड़ी ने जिस तरह गहलोत सरकार को अस्थिर करने और पायलट की बगावत का लाभ उठाने का प्रयास किया वसुंधरा राजे उसके पक्ष में नहीं थीं।

एनडीए के सहयोग राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के अध्यक्ष हनुमान बेनीवाल सहित भाजपा के कुछ नेताओं ने आरोप भी लगाए कि वसुंधरा राजे गहलोत सरकार की मदद कर रही हैं, लेकिन वसुंधरा राजे ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। भाजपा के अंदर चल रही सियासत को सचिन पायलट भी समझ गए। पायलट और उनके समर्थकों के समझ में आ गई कि गहलोत सरकार को गिराकर यदि वे भाजपा के सहयोग से सरकार बनाने का प्रयास करेंगे तो उसके लिए वसुंधरा राजे का सहयोग जरूरी है। वसुंधरा राजे सहयोग देने को तैयार नहीं थीं। 72 सदस्यीय भाजपा विधायक दल में खुद के 28 से 30 विधायक हैं, ऐसे में पायलट ने कांग्रेस में वापसी ही उचित समझी। वहीं कांग्रेस के कुछ नेता भी पायलट को पार्टी में वापस लाने का प्रयास कर रहे थे। 

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