लखनऊ, जेएनएन। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के 19वें प्रदेश अध्यक्ष के रूप में गुरुवार को स्वतंत्रदेव सिंह का निर्विरोध निर्वाचन हो गया। संगठनात्मक चुनावी प्रक्रिया के तहत स्वतंत्रदेव का एक मात्र नामांकन पत्र भरा गया था। इसके साथ राष्ट्रीय परिषद के 80 सदस्यों के पर्चे भी भरे गए। औपचारिक घोषणा शुक्रवार को प्रांतीय परिषद की बैठक में होगी।

भाजपा मुख्यालय में नामांकन जमा करने की प्रक्रिया दोपहर दो बजे से शाम चार बजे तक प्रदेश चुनाव अधिकारी आशुतोष टंडन गोपालजी की निगरानी में चली। इस मौके पर केंद्रीय सह पर्यवेक्षक के रूप में मंगल पांडेय भी मौजूद थे। बूंदाबांदी के बावजूद कार्यालय में दिन भर गहमागहमी रही। दूरदराज के जिलों से भी बड़ी संख्या में कार्यकर्ता आए थे।

प्रदेश अध्यक्ष पद के नामांकन के समय उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, महामंत्री (संगठन) सुनील बंसल, प्रदेश सह चुनाव अधिकारी त्रयबंक त्रिपाठी व वाईपी सिंह के अलावा उपाध्यक्ष जेपीएस राठौर, विजय बहादुर पाठक, गोविंद नारायण शुक्ला, विद्यासागर सोनकर भी मौजूद थे। प्रदेश सरकार के मंत्री महेंद्र सिंह, ब्रजेश पाठक, भूपेंद्र चौधरी व सुरेश राणा समेत बड़ी संख्या में विधायक और पार्टी पदाधिकारी उपस्थित थे। सह प्रदेश चुनाव अधिकारी त्रयबंक त्रिपाठी ने बताया कि प्रदेश में कुल 98 जिला संगठनों में 87 इकाइयों में चुनाव प्रक्रिया पूरी हो चुकी है।

प्रदेश अध्यक्ष बनने वाले स्वतंत्र देव 14 वें नेता

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पद पर आसीन होने वाले स्वतंत्रदेव 14 वें नेता हैं। एक से अधिक बार प्रदेश अध्यक्ष बनने वालों में कलराज मिश्र, कल्याण सिंह व स्व. माधव प्रसाद त्रिपाठी शामिल हैं। इस में कलराज मिश्र चार बार, कल्याण सिंह और माधव प्रसाद को दो बार मौका मिला। अब तक बने प्रदेश अध्यक्षों में माधव प्रसाद, कल्याण सिंह, राजेंद्र गुप्त, कलराज मिश्र, राजनाथ सिंह, ओमप्रकाश सिंंह, विनय कटियार, केशरीनाथ त्रिपाठी, डॉ. रमापति राम त्रिपाठी, सूर्यप्रताप शाही, डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी, केशव प्रसाद मौर्य व डॉ. महेंद्रनाथ पांडेय शामिल है। इसमें ओमप्रकाश सिंह को अपना कार्यकाल पूरा करने का मौका नहीं मिला।

जब निर्विरोध चुनाव में फंसा पेंच

प्रदेश भाजपा में अध्यक्ष के चुनाव मेंं सर्वसम्मति बनाने के तीन बार पेंच फंस था। पहली कोशिश जनसंघ के जमाने में वर्ष 1974 में नाकाम रही थी। तब रवींद्र किशोर शाही मतदान के बाद प्रदेश अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे। दूसरी बार 1980 में भाजपा बनने पर माधव प्रसाद त्रिपाठी के नाम पर कल्याण सिंह राजी नहीं थे। उन्होंने नामांकन पत्र दाखिल करके हलचल बढ़ा दी थी। नाम वापसी का समय निकल गया। मतदान टालने के लिए तत्कालीन प्रभारी सुंदर सिंह भंडारी ने दबाव बनाकर कल्याण सिंह को मैदान से हटने के लिए तैयार किया। वर्ष 2000 में जब कलराज मिश्र को दोबारा प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाना था तब रामप्रकाश त्रिपाठी ने चुनौती देते हुए अपना नामांकन भर दिया। मान मनौव्वल के बाद भी त्रिपाठी नहीं माने तो नामांकन की जांच में उनका पर्चा खारिज कर दिया गया और मतदान की स्थिति नहीं आ सकी।

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