नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। गैर कांग्रेसी विपक्षी दलों के आधा दर्जन दिग्गज नेताओं ने हिरासत में नजरबंद जम्मू-कश्मीर के तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों फारूख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती समेत सभी राजनीतिक बंदियों की तत्काल रिहाई की मांग उठाई है। विपक्षी नेताओं ने यह भी कहा है कि मोदी सरकार लोकतांत्रिक विरोध को दंडात्मक प्रशासनिक कार्रवाई से कुचल रही है। इस क्रम में प्रजातांत्रिक मूल्यों व मौलिक अधिकारों के साथ नागरिकों के स्वतंत्रता के अधिकार पर हमला बढ़ता जा रहा है।

इन नेताओं ने जारी किया संयुक्‍त बयान

पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौडा, एनसीपी प्रमुख शरद पवार, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी, माकपा महासचिव सीताराम येचुरी, भाकपा के डी राजा और राजद के मनोज कुमार झा ने एक संयुक्त बयान जारी कर यह मांग की। विपक्षी नेताओं की ओर से जारी इस बयान में भाजपा के दो पूर्व बड़े नेताओं यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी का नाम भी शामिल हैं। एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने इन सभी नेताओं की ओर से सोमवार को यह संयुक्त बयान जारी किया। इसमें कहा गया है कि विविधता में एकता के हमारे विचारों के साथ संविधान हमेशा खड़ा रहा है। लेकिन विरोध की आवाज को न केवल कुचला जा रहा बल्कि आलोचना के स्वरों को बदले की कार्रवाई के जरिये सुनियोजित तरीके से दबाने की कोशिश की जा रही है।

हालात सामान्य होने के सरकार के दावों पर उठाए सवाल

जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य होने के सरकार के दावों पर गंभीर सवाल उठाते हुए इन विपक्षी नेताओं ने कहा है कि तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों को बीते सात महीने से सतही आधार पर नजरबंद रखा गया है। इन तीनों नेताओं का पूर्व का ऐसा कोई रिकार्ड नहीं कि इनके बाहर रहने से कोई खतरा हो और पब्लिक सेफ्टी एक्ट लगाने का आधार ही झूठा है। हकीकत यह भी है कि इन तीनों नेताओं की पार्टियों के साथ भाजपा का केंद्र और राज्य में एक समय गठजोड़ रहा है। पब्लिक सेफ्टी एक्ट लगाने पर सवाल उठाते हुए विपक्षी नेताओं ने कहा कि अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर से यह विशेष संविधान खत्म कर दिया गया तो फिर जम्मू-कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट की वैधानिकता भी खत्म हो गई है।

विदेशी राजनयिकों की दो टीमों के दौरे पर उठाए सवाल

ऐसे में तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों की नजरबंदी उनके मौलिक अधिकारों का घोर उल्लंघन है। विपक्षी नेताओं के अनुसार सूबे के नेताओं के मौलिक अधिकारों का हनन को पांच अगस्त 2019 से निरंतर जारी जम्मू-कश्मीर के लाक डाउन के संदर्भ में और भी गंभीर है। यह कश्मीर के लाखों भाई-बहनों के संवैधानिक अधिकारों पर भी हमला है। कश्मीर के हालात सामान्य होने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के दावों पर सवाल उठाते हुए विपक्षी नेताओं ने कहा कि सरकार ने विदेशी राजनयिकों की दो टीमों के दौरे को विशेष रूप से प्रायोजित किया, लेकिन अपने देश के राजनीतिक प्रतिनिधियों और मीडिया को राज्य में मुक्त आने-जाने की इजाजत नहीं दी ताकि जमीनी हकीकत सामने आ सके। विपक्षी नेताओं ने कहा है कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों और संविधान की मर्यादा की सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्ध विपक्षी पार्टियां इस हालत में चुप नहीं बैठ सकतीं।

4 अगस्‍त को तीनों मुख्यमंत्रियों को लिया गया था हिरासत में 

गौरतलब है कि 5 अगस्‍त, 2019 को जम्‍मू-कश्‍मीर से अनुच्‍छेद 370 हटाए जाने और जम्‍मू-कश्‍मीर को दो केंद्र शासित राज्‍यों में बांटने से पहले 4 अगस्‍त की रात को जम्मू-कश्मीर के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती को हिरासत में लिया गया था। बाद में उनके खिलाफ जन सुरक्षा कानून (PSA) लगा दिया गया था।

प्रियंका गांधी, चिदंबरम और माकपा ने उठाए थे सवाल  

कुछ समय पहले कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने फारुक, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती पर पीएसए लगाने के सरकार के आधार पर सवाल उठाया था। वहीं पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने केंद्र सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि लोकतंत्र में बिना आरोप किसी को हिरासत में रखना सबसे निम्न स्तर का काम है। माकपा ने भी इसकी आलोचना करते हुए कहा था कि इस कदम से साफ है कि जम्मू-कश्मीर में सामान्य हालात का सरकार का दावा गलत है।

Posted By: Arun Kumar Singh

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