नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। दिल्ली के उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार के बीच अधिकारों को लेकर चल रही जंग के बीच ही अब केंद्रीय कैबिनेट ने एक प्रस्ताव को मंजूरी दी है जिससे उपराज्यपाल का अधिकार क्षेत्र और बढ़ेगा। प्रस्तावित विधेयक में उपराज्यपाल को दिल्ली सरकार को तय समय में विधायी और प्रशासनिक प्रस्ताव 15 दिन पहले भेजना होगा। ऐसे मुद्दे जिसपर दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के विचार एक जैसे नहीं होंगे उसे आखिरी मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास भेजने का तो प्रविधान है ही, नए प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि जब तक राष्ट्रपति फैसला नहीं लेते हैं, उपराज्यपाल को कोई फैसला लेने का अधिकार होगा। 

यह प्रविधान इसलिए अहम होगा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले में कहा गया था कि दिल्ली सरकार को हर मामले में राज्यपाल को संस्तुति लेना जरूरी नहीं है, बल्कि उन्हें इसकी जानकारी दी जा सकती है। इस फैसले के बाद से उपराज्यपाल की ताकत कुछ हद तक कमजोर हुई थी। सूत्रों का कहना है कि इन संशोधनों से गवर्नेंस में सुधार होगा। इससे उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार के बीच तनातनी घटाने में मदद मिलेगी। 

अधिकारों के स्पष्ट वितरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जनवरी 2019 में आए फैसले के बाद स्थितियों को साफ करने की जरूरत पड़ी है। ध्यान रहे कि पिछले कुछ वर्षो में अधिकारों को लेकर दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच तनातनी रही है। मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया और उसने अधिकारों का बंटवारा किया।

सरकार की ओर से अभी तक औपचारिक रूप से इसकी घोषणा नहीं की गई है, लेकिन जब यह मामला संसद में आएगा तो सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच घमासान किस कदर होगा इसकी झलक गुरुवार को ही मिल गई। संभव है कि किसानों का मुद्दा नरम पड़ने पर विपक्ष इसे अपना हथियार बना ले।

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