नोएडा [पंकज मिश्रा]। समाजवादी पार्टी के साथ उत्तर प्रदेश में गठबंधन करके 38 में से 10 सीटें जीतने वाली बहुजन समाज पार्टी मुखिया मायावती को अपने ही गृह जिले गौतमबुद्ध नगर में एक बार फिर झटका लगा है। गौतमबुद्धनगर लोकसभा सीट पर इस बार गठबंधन के कमजोर प्रत्याशी ने हरा दिया। 

बावजूद इसके ढाई दशक बाद बसपा-सपा गठबंधन होने के बाद से ही जिले के सपा-बसपा के पुराने दिग्गजों में टिकट को लेकर कसरत तेज कर दी थी। इनमें कई नेता तो ऐसे भी थे, जो दल बदल कर टिकट पाने की हसरत पाल बैठे थे, लेकिन इन सभी के बीच अंतर्विरोध को देखते हुए पार्टी ने अपेक्षाकृत कम अनुभवी व एक नए चेहरे सतवीर नागर पर दांव लगाया। लेकिन कम अनुभव व जमीन पर मजबूत पकड़ न होने के कारण गठबंधन के बावजूद बसपा-सपा प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा।

दोनों ही दलों के पुराने नेता गठबंधन के बाद जीत को लेकर काफी आश्वस्त थे। यही वजह है कि टिकट को लेकर अंत तक नेताओं में रस्साकसी जारी रही और सभी पुराने खिलाड़ी अपने-अपने छत्रपों से संपर्क कर टिकट की जुगत में लगे रहे। बसपा सुप्रीमो मायावती का गृह जनपद होने के कारण अपेक्षानुरूप गौतमबुद्ध नगर सीट बसपा के खाते में गई, लेकिन टिकट को लेकर अंत तक संशय बना रहा। राज्यसभा सांसद सुरेंद्र नागर, जेवर के पूर्व विधायक वेदराम भाटी, दादरी के पूर्व विधायक नरेंद्र भाटी, दादरी के ही पूर्व विधायक सतवीर गुर्जर, करतार नागर, सतीश अवाना समेत दोनों ही दलों में लगभग आधा दर्जन नेता टिकट के लिए अपनी दावेदारी कर रहे थे। यह अलग बात है कि वेदराम भाटी व नरेंद्र भाटी का परिवार भाजपा में शामिल हो गए।

बार-बार टिकट बदलने से बनी भ्रमित हुए मतदाता
बसपा द्वारा बार-बार टिकट बदलने से भी उसको चुनावों में काफी नुकसान उठाना पड़ा। जब तक मतदाताओं के बीच किसी प्रत्याशी के बीच रुझान बनता तभी आलाकमान से टिकट बदलने का फरमान जारी हो जाता। बसपा ने सबसे पहले वीरेंद्र डाढ़ा को टिकट देने की घोषणा की बाद में उनका टिकट काटकर चीती निवासी संजय भाटी को टिकट दे दिया गया। बाद में बाइक बोट फर्जीवाड़े में एफआइआर दर्ज होने के कारण उनका भी टिकट काटकर आनन-फानन में सतवीर नागर पर दांव लगाया। प्रचार के लिए कम समय मिलने व चुनावों का ज्यादा अनुभव न होने के कारण सतवीर नागर पार्टी के कोर मतदाता तक भी नहीं पहुंच सके। वहीं, पार्टी के ही नेताओं के बीच अंतर्विरोध होने के कारण बसपा के पुराने नेताओं का भी सतवीर को अपेक्षित सहयोग नहीं मिल सका।

टिकट न मिलने से  बड़े नेताओं ने बना ली थी दूरी
टिकट की आस में बैठे नेताओं को निराशा हाथ लगने पर नेताओं ने भी चुनाव प्रचार से दूरी बना रखी थी। सतवीर गुर्जर व गजराज नागर तो चुनाव प्रचार में नजर आए, लेकिन बाकी दिग्गजों ने अप्रत्यक्ष रूप से बसपा-सपा प्रत्याशी के चुनाव प्रचार से दूरी बना रखी थी। बमुश्किल एक-दो सभाओं में ही दोनों दलों के नेता नजर आए।

कभी मायावती का गढ़ कहे जाने वाले गौतमबुद्ध नगर लोकसभा सीट पर 2019 में शहर से लेकर देहात तक भाजपा का डंका बजा। इसके आगे गठबंधन के सभी जातिगत समीकरण फेल हो गए। 2019 में लोकसभा सीट पर करीब ढाई लाख मतदाता बढ़े थे। इसमें सबसे अधिक मतदाता नोएडा व दादरी सीट पर बढ़े थे। जो भाजपा का सबसे मजबूत गढ़ है। इनका पूरा फायदा भाजपा की झोली में गया।

नोएडा विधानसभा ने भाजपा प्रत्याशी को करीब दो लाख वोट की बढ़त दिलाई, जिसकी भरपाई करना गठबंधन के लिए पूरी तरह से नामुमकिन साबित हुआ। जेवर, दादरी व सिकंद्राबाद विधानसभा ने भी गठबंधन के मंसूबों पर पानी फेर दिया। बिरादरी और जातिगत समीकरण को धता बताते हुए इन विधानसभा के मतदाताओं ने भी भाजपा का साथ दिया। हालांकि जेवर विधानसभा में दोनों प्रत्याशियों में वोट का अंतर सबसे कम रहा।

जेवर विधानसभा में भाजपा 7259 मतों के अंतर से गठबंधन पर भारी पड़ी। ठाकुर प्रत्याशी देने के बावजूद कांग्रेस को पांचों विधानसभा में जेवर विधानसभा पर सबसे कम 3106 वोट ही मिले। 2014 की मोदी लहर में सपा बसपा ने अलग अलग चुनाव लड़ा था।

इस चुनाव के आंकड़ों के लिहाज से देखा जाए तो नोएडा व खुर्जा को छोड़कर सपा-बसपा दोनों के वोट के हिसाब गठबंधन दादरी, जेवर, सिकंद्राबाद में भाजपा पर भारी पड़ा था। लेकिन उस चुनाव में भी नोएडा ने भाजपा को अजय बढ़त दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी। करीब सवा लाख से भाजपा नोएडा में सपा-बसपा के संयुक्त वोट के अंतर से आगे थी।

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