गोरखपुर [डॉ. राकेश राय]। अयोध्या में जन्मभूमि पर श्रीराम मंदिर निर्माण को लेकर 500 सालों से चल रहे संघर्ष का सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने बड़ी खूबसूरती से समाधान कर दिया है। संयोग है कि जब रामलला के पक्ष में फैसला आया है तो उस निर्णय को लागू करने के लिए मुख्यमंत्री के रूप में गोरखनाथ मंदिर के महंत योगी आदित्यनाथ मौजूद हैं। गोरखनाथ मंदिर से राम मंदिर का यह रिश्ता नया नहीं बल्कि तीन पीढ़ी का है। मुख्यमंत्री बनने के बाद से योगी आदित्यनाथ का अयोध्या के प्रति विशेष जुड़ाव दिखता आ रहा है। रामलला के दर्शन करने से लेकर दीपोत्सव के रूप में अयोध्या के गौरव को लौटाने का प्रयास और सैकड़ों करोड़ की विकास योजनाओं से यह साफ भी होता है।

श्रीराम जन्मभूमि मामले में जब भी कोई महत्वपूर्ण घटना घटी, उसका नाता नाथ पीठ से जरूर रहा। शुरुआत 22-23 दिसंबर 1949 से करते हैं, जब विवादित ढांचे में रामलला का प्रकटीकरण हुआ। उस समय तत्कालीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत दिग्विजयनाथ कुछ साधु-संतों के साथ वहां संकीर्तन कर रहे थे।

महंत अवेद्यनाथ ने 1984 में देश के सभी पंथों के शैव-वैष्णव आदि धर्माचार्यों को एक मंच पर लाकर श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन किया। वह आजीवन अध्यक्ष चुने गए। महंत के नेतृत्व में सात अक्टूबर 1984 को अयोध्या से लखनऊ के लिए धर्म यात्रा निकाली गई। लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्क में ऐतिहासिक सम्मेलन हुआ, जिसमें 10 लाख लोगों ने हिस्सा लिया। 1986 में जब फैजाबाद के जिला जज ने हिंदुओं को प्रार्थना करने के लिए विवादित मस्जिद के दरवाजे पर लगा ताला खोलने का आदेश दिया था तो ताला खोलने के लिए वहां पर गोरखनाथ मंदिर के तत्कालीन महंत अवेद्यनाथ मौजूद थे।

22 सितंबर 1989 को अवेद्यनाथ की अध्यक्षता में दिल्ली में विराट हिंदू सम्मेलन हुआ, जिसमें नौ नवंबर 1989 को जन्मभूमि पर शिलान्यास कार्यक्रम घोषित किया गया। तय समय पर एक दलित से शिलान्यास कराकर महंत ने आंदोलन को सामाजिक समरसता से जोड़ा। हरिद्वार के संत सम्मेलन में तो उन्होंने 30 अक्टूबर 1990 को मंदिर निर्माण की तिथि घोषित कर दी। निर्माण शुरू कराने के लिए जब वह 26 अक्टूबर को दिल्ली से अयोध्या के लिए रवाना हुए तो पनकी में गिरफ्तार कर लिए गए।

23 जुलाई 1992 में मंदिर निर्माण के लिए अवेद्यनाथ की अगुवाई में एक प्रतिनिधि मंडल तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव से मिला। बात नहीं बनी तो 30 अक्टूबर 1992 को दिल्ली में हुए पांचवें धर्म संसद में छह दिसंबर 1992 को मंदिर निर्माण के लिए कारसेवा शुरू करने का निर्णय ले लिया गया। कारसेवा का नेतृत्व करने वालों में अवेद्यनाथ भी शामिल रहे। उसके बाद तो गोरखनाथ मंदिर जन्मभूमि आंदोलन का प्रमुख केंद्र बन गया। 12 सितंबर 2014 को अवेद्यनाथ के ब्रह्मलीन होने के बाद जिम्मेदारी योगी आदित्यनाथ ने संभाली।

राम मंदिर के लिए की राजनीति में वापसी

1980 में तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में बड़े पैमाने पर कराए गए धर्म परिवर्तन से व्यथित होकर महंत अवेद्यनाथ ने राजनीति से संन्यास ले लिया, लेकिन मंदिर निर्माण को लेकर उनका संघर्ष जारी रहा। 22 सितंबर 1989 को हिंदू सम्मेलन के दौरान जब मंदिर निर्माण की तारीख घोषित कर दी गई तो तत्कालीन गृह मंत्री बूटा सिंह ने इसे स्थगित करने के लिए उनसे मुलाकात की। अवेद्यनाथ ने कहा कि यह फैसला करोड़ों लोगों का है। इस पर बूटा सिंह ने उन्हें लोगों की बात कहने के लिए संसद में आने की चुनौती दी। अवेद्यनाथ ने राजनीति में वापसी की और फिर हिंदू महासभा से गोरखपुर के सांसद बने।

ढाई साल में 18 बार अयोध्या गए सीएम योगी

मुख्यमंत्री योगी ढाई साल में 18 बार अयोध्या गए। इसके साथ ही योगी 27 साल में भाजपा के ऐसे दूसरे मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने रामलला विराजमान के दर्शन किए हैं। 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाए जाने के बाद से अब तक बड़े नेताओं ने रामलला विराजमान के दर्शन से दूरी बना रखी है। बीते 27 साल में मुलायम सिंह यादव, मायावती, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव भी रामलला नहीं गए। पहले दीपोत्सव में ही योगी ने मुख्यमंत्री के रूप में फैजाबाद का नाम अयोध्या करके जन भावनाओं को मूर्त रूप करने का मार्ग बना दिया था।

Posted By: Umesh Tiwari

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