सुंदरनगर, कुलभूषण चब्बा। त्योहार या उत्सव किसी राष्ट्र के जीवित होने का प्रमाण होते हैं। भारत एक प्राचीन राष्ट्र है और यहां अनेक जातियां समय-समय पर आकर बसती रही हैं। यहां के सांस्कृतिक जीवन में अनेक मोड़ आए तथा कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं को याद रखने के लिए हमारे यहां त्योहार और मेले मनाने की प्रथा चल पड़ी। अपने प्रारंभिक रूप में मेले और त्योहार केवल खुशियां मनाने के लिए थे, परंतु कालांतर में अनेक ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक कारण  इससे जुड़ गए। किसी समाज के सांस्कृतिक जीवन का असली रूप त्याेहारों व मेलों के अवसरों पर ही देखने को मिलता है। इन त्योहारों और मेलों से उस क्षेत्र की लोक पर परा इतिहास, सामाजिक परिवेश का विंव उभरता है।

यहीं लोगों के वर्तमान को अतीत से बांधकर उनकी मूल परंपराओं को अक्षुण बनाए रखते हैं। मेले और त्योहार जहां हमारे जीवन में खुशियां लेकर आते हैं। हमें नए उत्साह से भर जाते हैं। वहीं नई जीवन शक्ति एवं प्ररेणा का बीज डाल जाते हैं। त्योहार हमारी जीवन्तता के प्रतीक है। सुंदरनगर का ऐतिहासिक राज्यस्तरीय नलवाड़ व पारंपरिक देवता मेला  इस बात का सूचक है। सुकेत रियासत के समय शुरू हुआ नलवाड़ मेला व्यापारिक दृष्टि से एक दिन उत्तरी भारत का अग्रणी मेला बन जाएगा। इस बात की आयोजकों ने शायद  कभी कल्पना नहीं की होगी। अच्छी नस्ल के पशुओं की क्रय विक्रय करने के लिए व्यापारियों व किसानों को इस नलवाड़ मेले का वर्ष भर इंतजार रहता है। सांस्कृतिक धरोहर को अपने आप में समेटे मेले जहां देव समागम की अदभुत छटा को चहुं दिशाओं में बिखेरते हैं, वहीं पारंपरिक संस्कृति को आम जनमानस के मानसिक पटल पर उकेरते हुए नई पीढ़ी को आध्यात्म की ओर आकर्षित करते हैं।

राजा करतार सेन हैं मेले के अग्रज

मंडी  तत्कालीन सेन वंश के राजा करतार सेन ने ग्रामीण परिवेश में कृषि को सुदृढ़ व उन्नत बनाने के लिए सुंदरनगर में सुकेत नलवाड़ मेले का शुभारंभ किया, ताकि सुकेत रियासत एवं इसके साथ लगती रियासतों के किसान अपनी आवश्यकता अनुसार पशुओं की क्रय विक्रय कर सकें। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नलवाड़ मेले ने नित नए आयामों को छुआ व धीरे-धीरे यह नलवाड़ मेला प्रदेश का हर नही बल्कि उत्तरी भारत में पशु मंडी के रूप में विख्यात हुआ। सरकार ने मेले की महत्ता को देखते हुए इसे राच्य स्तरीय घोषित किया। किसानों के ज्ञान वर्धन के लिए यहां विभिन्न प्रदर्शनियों एवं मनोरंजन के लिए छिंज व अन्य सांस्कृतिक संध्याओं का आयोजन किए जाने लगा। धीरे-धीरे इससे क्षेत्र में किसानों की समृद्धि हुई।

मेले से स्थानीय नगर परिषद को अच्छा खासा राजस्व प्राप्त होने लगा। विज्ञान की नई खोजों ने इस मेले की मौलिकता पर आज प्रश्न चिंह लगा दिया है। ट्रैक्टर के आविष्कार से मैदानी भागों में बैलों के द्वारा खेत को जोतने की प्रथा पूर्णत: बंद हो गई। कृषि जोत दिन ब दिन घटने की सूरत में बैलों की जोड़ी पालना स्वयं ही असंभव हो गया। आज हालत इस कदर बदल चुके हैं कि बैल पालना स्टेटस सिंबल से बाहर हो चुका है, जो कोई बैल पाल लेता है वह अपना छोटा-मोटा कृषि कार्य पूरा करने के बाद इन्हें बेसहारा छोड़ देता है। महंगी जोड़ियां जो मैदानी भागों में पाली जाती थी तथा इस मेले की शान हुआ करती थी, आज विलुप्त हो चुकी हैं। मेले में पहाड़ी क्षेत्रों में पाले जाने वाले बैल जिन्हें स्थानीय भाषा में 'बोलू' कहते हैं,वहीं नजर आते हैं।

पांच सौ वर्ष पुराना है मेले का इतिहास

मंडी मेले हमारी संस्कृति, सभ्यता,भाईचारे व आपसी मेलजोल के प्रतीक माने जाते हैं। इनमें उत्तरी ाारत का प्रसिद्ध सात दिवसीय सुंदरनगर नलवाड़ मेला  शुमार है। मेला प्रत्येक वर्ष 22 से 28 मार्च तक मनाया जाता है। सुकेत रियासत के राजा करतार सेन के समय से ही नलवाड़ मेले को मनाने की परंपरा चली आ रही है। नलवाड़ मेले का इतिहास पांच सौ वर्ष पुराना है। सुकेत के रियासत के राजा करतार सेन ने इस पशु मेले को 'तंगड़ मंडी' के नाम से करतारपुर (पुराना नगर) से प्रारंभ किया था। ऐसी  किवदंती है कि 1520 ईस्वी में तत्कालीन राजा करतार सेन ने अपनी राजधानी लोहारा से करतारपुर वर्तमान में पुराना बाजार में स्थापित किये जाने के उपलक्ष्य में इस मेले का शुभारंभ किया था। बताते हैं कि कुछ वषरें के बाद पुराना नगर में पानी की किल्लत से परेशान राजा ने अपनी राजधानी यहां से चत्तरोखड़ी (बनेड़) में सुंदरनगर वन के पास स्थानांतरित कर दी। इसके अलावा लोगों में मेले को लेकर तरह-तरह की बातें की जाती हैं।

नाम के साथ ही बदला स्थान

मंडी करतारपुर (पुराना नगर) से राजधानी स्थानांतरित होने के बाद मेला स्थल  बदल गया। पहले यह मेला मेला चौगान नामक स्थान पर लगता था, वर्तमान में जहां राजकीय माध्यमिक पाठशाला है। राजधानी तबदील होने के साथ  यह मेला भोजपुर के निकट नगौण खड्ड में मनाया जाने लगा।

28 साल पहले मिला था राज्‍यस्तरीय दर्जा

मंडी शुकदेव ऋषि की तपोभूमि सुंदरनगर में नलवाड़ मेले का अहम स्थान है। मेले में किसानों को जहां एक ही स्थान पर अच्छी नस्लों के मवेशी खरीदने का मौका मिलता है,वहीं व्यापारियों को अपने पशु बेचने का अच्छा बाजार मिल जाता है। नलवाड़ मेले की कमान नगर परिषद तो कभी प्रशासन के हाथों रही। गत कुछ वर्षो से मेले का आयोजन अब प्रशासन करता आ रहा है। 22 मार्च 1994 को राज्‍य सरकार ने इसे मेले को राज्य स्तरीय दर्जा प्रदान किया था। मेले में पारंपरिक परंपराओं का निर्वाह आज किया जाता है। नगौण खड्ड  में बैल पूजन के खूंटी गाड़ने के बाद जवाहर पार्क में ध्वजारोहण के बाद मेला विधिवत रूप से शुरू होता है।

कुश्ती होती है आकर्षण

मंडी  नलवाड़ मेले के अंतिम दो दिनों में कुश्तियां लोगों के आकर्षण का केंद्र होती है। कुश्ती मुकाबलों में स्थानीय पहलवानों के साथ-साथ पड़ोसी राच्य पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश व जम्मू कश्मीर के कई नामी पहलवान भाग लेते हैं। कुश्तियों प्रतियोगिता में कड़े मुकाबलों में सुकेत कुमार व सुकेत केसरी का चयन होता है।

मेले में होती है बैलों की खरीद फरोख्त 

मंडी बैलों की खरीद-फरोख्त में अन्य मेलों को पछाड़ इस पशु मेले का प्रारंभ गौध्वजा पूजन से होता हे। मेले में हजारों की संख्या में पशुओं का क्रय-विक्रय होता है। बैलों की खरीद -फरोख्त के मामले में यह मेला पड़ोसी जिला बिलासपुर की नलवाड़ को पछाड़ता आ रहा है। कोरोना की वजह से दो साल से मेले का आयोजन नहीं हुआ था। 

 जब त्रांबड़ी जंगल में राजमहल बना

मंडी  इतिहास के पन्नों को पलट कर देखा जाए तो बताते हैं कि राजा पर्वत सेन के साथ 1500 ईस्वी में एक त्रासद घटना घटी। पर्वत सेन के पास शिकायत आई कि एक ब्राह्मण ने राजसी महिला के साथ अनैतिक संबंध बना रखे हैं। इस बात को लेक आगबबूला राजा ने बगैर किसी प्रमाण व जांच के ब्राह्मण पुरोहित को जमकर फटकार । पुरोहित ने अपनी निर्दोषता के विरुद्ध आवाज  उठाई लेकिन राजा टस से मस नही हुआ। दुखी पुरोहित ने राजा को श्राप देकर आत्महत्या कर ली। बताते हैं कि इस घटना के बाद राजा बीमार हो गया। बाद में सुकेत रियासत के सिंहासन पर जब करतार सेन सत्तासीन हुए तो उनके मन में यह संदेश घर गया कि लोहारा ब्रहम हत्या के कारण श्राप ग्रस्त हो गया है इसलिए उन्होंने अपनी राजधानी स्थानांतरित कर डाली व त्रा बड़ी वन में महल का निर्माण करवाया।

नलवाड़ मेले का समृद्ध इतिहास

मंडी  सुंदरनगर का नलवाड़ मेला उत्तर भारत का सबसे पुराना पशु मेला माना जाता है। जनश्रुति अनुसार प्राचीन सुकेत रियासत में सेन वंश के एक राजा को उन पर पड़ने वाले बुरे ग्रहों के निवारण के लिए एक विद्वान ने एक हजार बैलों के पूजन का उपाय बताया। उसके बाद इसी वंश के शासक करतार सेन ने मेले का आरंभ किया। कुछ इतिहासकार इसे राजा नल से जोड़ते हैं तो दूसरे मत के अनुसार नलवाड़ शब्द बंगाल व असम से आया हुआ बताते हैं, जिसका अर्थ हाट बाजार से है।

आधुनिकता से लगा परंपरा को ग्रहण

मंडी सुकेत रियासत में मेले व त्योहारों की गौरवशाली परंपरा रही है। आधुनिकता व अनदेखी के चलते इस समृद्धशाली परंपरा को ग्रहण लगने से अधिकांश मेलों का वजूद सिमटने के कगार पर है। पुराना बाजार के चौगान में झकड़याधी जातरा, आंबेडकर नगर में ओड़की मेला, डिनक में डिनक मेला तथा महादेव,भौण, डैहर, पांगणा आदि स्थानों में मेलों का आयोजन होता था। झकड़याधी जातर में सुकेत रियासत के दूरदराज क्षेत्रों से आए लोग न्योजे, पूहलें, भंगोलू, ऊन, पश्म से बने गर्म वस्त्र आदि का व्यापार करते थे। डिनक मेला हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक माना जाता था। समय के साथ-साथ स  मेले इतिहास  के पन्नों में सिमट गए।

Edited By: Richa Rana