लखनऊ, जेएनएन। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रूप में प्रचारित और चर्चित गुमनामी बाबा उर्फ भगवानजी की शिनाख्त करने में जस्टिस विष्णु सहाय आयोग नाकाम रहा है। अलबत्ता उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आयोग ने दोनों के बीच कई समानताएं पाई हैं। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया है कि गुमनामी बाबा सुभाष चंद्र बोस के अनुयायी थे। हालांकि जिस समय यह बात प्रसारित होने लगी थी कि वह सुभाष चंद्र बोस हैं, उन्होंने तत्काल अपना मकान बदल लिया था।

फैजाबाद के राम भवन में रहने वाले गुमनामी बाबा की असलियत का पता लगाने के लिए गठित किए गए जस्टिस विष्णु सहाय आयोग की रिपोर्ट गुरुवार को विधानमंडल के शीतकालीन सत्र के आखिरी दिन दोनों सदनों में पेश की गई। रिपोर्ट के निष्कर्ष में कहा गया है कि गुमनामी बाबा बंगाली थे और बंगला, अंग्रेजी व हिंदी भाषाओं के जानकार थे। वह एक असाधारण मेधावी व्यक्ति थे। राम भवन के जिस भाग में वह निवास करते थे उसमें बड़ी संख्या में मिलीं बंगला, अंग्रेजी और हिंदी की किताबें इसकी गवाही देती हैं।

उन्हें युद्ध, राजनीतिक और सामयिक विषयों की गहन जानकारी थी। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के स्वर के समान उनकी आवाज में भी प्राधिकार का भाव था। उनमें प्रचंड आत्मबल और आत्मसंयम था, जिसने उन्हें जीवन के अंतिम 10 वर्षों में अयोध्या और फैजाबाद में पर्दे के पीछे रहने के योग्य बनाया था। जो लोग पर्दे के पीछे से उनसे बात करते थे, वे उनसे सम्मोहित हो जाते थे। वह पूजा और ध्यान में पर्याप्त समय व्यतीत करते थे। संगीत, सिगार और भोजन के प्रेमी भी थे। भारत में शासन की स्थिति से उनका मोहभंग था। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसे लोग बहुत ही कम होते हैं जो अपनी पहचान जाहिर होने के बजाय मृत्यु को पसंद करते हैं।

गौरतलब है कि गुमनामी बाबा का देहावसान 16 सितंबर 1985 को हुआ था। उनकी पहचान का पता लगाने के लिए हाईकोर्ट के निर्देश पर अखिलेश सरकार ने 28 जून 2016 को जस्टिस विष्णु सहाय आयोग गठित किया था। आयोग ने 19 सितंबर 2017 को अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपी थी। कैबिनेट ने बीती जुलाई में आयोग की रिपोर्ट को विधानमंडल में पेश करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी।

Posted By: Umesh Tiwari

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