लखनऊ, जेएनएन। राज्यपाल राम नाईक का स्पष्ट तौर पर मानना है कि उत्तर प्रदेश अब सर्वोत्तम प्रदेश बनने की राह पर है, जिसमें रामायण के सेतुबंध प्रसंग में वर्णित गिलहरी सरीखा उनका भी योगदान रहा है। नाईक याद दिलाते हैैं कि पांच वर्ष पहले राज्यपाल बनने पर उन्होंने राज्य को उत्तम प्रदेश बनाने का संकल्प लिया था।

प्रदेश को आगे बढ़ाने में अखिलेश और योगी सरकार में से किसकी बड़ी भूमिका के सवाल का सीधा जवाब न देकर नाईक ने कहा कि दोनों ही सरकारें उनकी रहीं हैैं और दोनों के साथ अच्छे संबंध भी रहे हैैं। दोनों के बीच तुलना को वह उचित नहीं समझते। सरकारों का कामकाज जनता देखती है और वही उस पर निर्णय करती है। हालांकि, राज्यपाल को लगता है कि मौजूदा सरकार जनता को ध्यान में रख काम कर रही है। यही कारण है कि उन तक पहुंचने वाले पत्रों की संख्या में पूर्व के वर्षों की तुलना में गिरावट आई है।

वैसे तो नाईक ने सोमवार को राजभवन में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में अपने पांचवे वर्ष के कामकाज पर 'राजभवन में राम नाईक 2018-19' नाम से 122 पेज की हिंदी-उर्दू की पुस्तक का लोकार्पण किया, लेकिन इस मौके पर उन्होंने अपने पांच वर्ष के पूरे हो रहे कार्यकाल की प्रमुख उपलब्धियां भी गिनाई। 22 जुलाई, 2014 को राज्यपाल की कुर्सी संभालने के बाद किए गए संकल्प की याद दिलाते हुए नाईक ने कहा कि उनकी कोशिश रही कि उत्तर प्रदेश, उत्तम प्रदेश बने।

सत्ता परिवर्तन के बाद 2017 में योगी सरकार बनने पर उन्होंने प्रदेश को सर्वोत्तम प्रदेश बनाने का लक्ष्य तय किया। अब वह कह सकते हैैं कि राज्य, सर्वोत्तम प्रदेश बनने की राह पर चल रहा है, जिसमें उनके भी प्रयास शामिल हैैं। पूर्व की अखिलेश व मौजूदा योगी सरकार में से बेहतर कौन के सवाल पर नाईक ने कहा कि दोनों ही सरकारें मेरी रही हैैं। अखिलेश यादव हों या फिर योगी आदित्यनाथ, दोनों से मेरे व्यक्तिगत संबंध अच्छे थे, हैैैं और रहेंगे। एक बच्चा काम करता है और दूसरा भी। मैैं दोनों में तुलना करने को उचित नहीं समझता। जनता तय करती है कि किसका अच्छा काम है और वही निर्णय करती है।

सबसे अच्छे लखनऊ वाले

विभिन्न पदों पर रहते कई राज्यों में वर्षों गुजारने वाले राम नाईक को पांच वर्ष राज्यपाल रहते सबसे ज्यादा लखनऊ वाले पसंद आए। नाईक कहते हैं कि लखनऊ के लोग सबसे अच्छे हैं। इससे पहले पंसद के सवाल पर राज्यपाल ने जब कहा कि खाने-पीने की पसंद के बारे में बहुत कुछ बता सकता हूं तो जोर के ठहाके लगे।

काम का नशा

पूरी तरह से सक्रिय 85 वर्षीय राम नाईक कहते हैैं कि उन्हें काम करने का नशा है। काम करने में आनंद आता है। वह बताते हैैं कि राज्यपाल वर्ष में 20 और पांच वर्ष में 100 दिन अवकाश पर रह सकते हैैं, लेकिन 22 जुलाई 2014 से 6 जुलाई तक वह सिर्फ 22 दिन अवकाश पर रहे। तीसरे व चौथे वर्ष में तो उन्हें छुट्टी लेने का वक्त ही नहीं मिला। नाईक मुस्कराते हुए बताते हैैं कि उनका ज्यादा काम करना दूसरों को भी काम करने के लिए बाध्य करता है।

आखिरी मुलाकात नहीं

22 जुलाई, 2014 को राज्यपाल बने राम नाईक बताते हैैं कि संवैधानिक व्यवस्था के तहत राज्यपाल का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है। सामान्यता पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा होने के बाद भी तब तक मौजूदा राज्यपाल बना रहता है जब तक दूसरे की नियुक्ति व शपथ न हो जाए। 22 जुलाई को कार्यकाल पूरा होने के बाद उनके बने रहने के सवाल पर कहते हैैं कि देखेंगे क्या होता है? इसके साथ ही नाईक कहते हैैं कि आज की मुलाकात उनकी आखिरी मुलाकात नहीं है। जानकारों का मानना है कि राज्य में भाजपा की सरकार बनाने में नाईक की भी अहम भूमिका रही है। ऐसे में नाईक को 22 जुलाई के बाद भी यहां का राज्यपाल बनाए रखा जा सकता है या फिर उनकी सक्रियता को देखते हुए कोई और अहम दायित्व सौंपा जाएगा।

कुष्ठ पीड़ितों पर दोनों सीएम का मिला साथ

राम नाईक ने बताया कि कुष्ठ पीड़ितों का पुुनर्वास उनका प्रिय विषय रहा है। इनकी भलाई में मुख्यमंत्री रहते अखिलेश यादव के साथ ही अब योगी आदित्यनाथ ने भी उनका साथ दिया है। उनके प्रयास से अखिलेश सरकार ने जहां 2500 रुपये महीने निर्वहन भत्ता शुरू किया वहीं योगी सरकार 3791 कुष्ठ पीड़ितों को पक्के आवास दे रही है।

राजभवन के द्वार खुले तो लगीं कतारें

सूबे के प्रथम नागरिक के तौर पर राज्यपाल ने सोमवार को जब अपने पांचवें वर्ष के कार्यवृत्त 'राजभवन में राम नाईक' को जारी किया तो उसमें दर्ज आंकड़े उनके संकल्प की गवाही दे रहे थे। पांच वर्षों के दौरान उन्होंने राजभवन में 30,225 आम लोगों से मुलाकातें कीं और उनके 2.19 लाख पत्र लेकर आगे बढ़ाया। नाईक ने बताया कि उनकी कोशिश रही कि संबंधित पत्रों का निस्तारण कर चिट्ठी भेजने वाले को भी उससे अवगत कराया जाए। उन्होंने बताया कि पांच वर्षों में उन्होंने राष्ट्रपति को 119 और प्रधानमंत्री को 199 पत्र लिखे। इस अवधि में उनकी ओर से उप राष्ट्रपति, केंद्रीय मंत्रियों और अन्य प्रदेशों के राज्यपालों को भी 551 पत्र लिखे गए।

पांच साल में मुख्यमंत्री को भेजे 1623 पत्र

राज्यपाल ने पहले दो वर्षों के दौरान मुख्यमंत्री को 518 तथा चौथे व पांचवें वर्षों के दौरान 844 पत्र लिखे। वहीं तीसरे वर्ष यानी 2016-17 में उन्होंने मुख्यमंत्री को 326 पत्र लिखे। पहले दो वर्षों के दौरान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव थे जबकि तीसरे वर्ष के दौरान मार्च 2017 में सरकार बदल गई और योगी आदित्यनाथ सूबे के नये मुख्यमंत्री बने। विगत पांच वर्षों के दौरान उन्होंने राज्य सरकार के मंत्रियों को 634 पत्र लिखे।

जब पत्नी ने रखी शर्त

राज्यपाल ने बताया कि जीवन के अच्छे-बुरे दिनों में उन्हें अपनी पत्नी कुंदा नाईक का भरपूर सहयोग मिला। युवावस्था में मुंबई में एक अच्छी कंपनी में नौकरी के दौरान उन्होंने जनसंघ को अपनी सेवाएं देने की सोची। पत्नी से जब उन्होंने अपनी इच्छा जतायी तो उन्होंने कहा कि 'मैं आपको रोकूंगी नहीं लेकिन मेरी भी एक शर्त है। राजनीति में अनिश्चितता बनी रहती है। इसलिए मैं नौकरी करूंगी।' इसके बाद उनकी पत्नी ने बीएड कोर्स किया और फिर नौकरी। बकौल नाईक, उन्हें अपनी दोनों बेटियों का भी सहयोग मिलता रहा है।

नाईक ने गिनाईं विशेष उपलब्धियां

  • राज्यपाल की अध्यक्षता में कुंभ के लिए गठित समिति के सुझाव पर इलाहाबाद का नामकरण प्रयागराज होना। कुंभ का भव्य और दिव्य आयोजन जिसमें राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तीनों पहली बार आए। अक्षयवट और सरस्वती कूप जनता के दर्शनार्थ खोले गए।
  • किसानों की आय दोगुनी करने के लिए राष्ट्रपति की ओर से गठित राज्यपालों की समिति के अध्यक्ष नामित। समिति ने राष्ट्रपति को सौंपी रिपोर्ट।
  • उत्तर प्रदेश दिवस का आयोजन शुरू होना। उनके कहने पर ही 2018 में पहली बार 24 जनवरी को सरकारी स्तर से उत्तर प्रदेश दिवस मनाया गया।
  • वाराणसी, आगरा, मेरठ और लखनऊ में मराठी गीत रामायण का आयोजन।
  • केंद्र में मत्स्य संवर्धन मंत्रालय का गठन।
  • संस्मरणों पर आधारित पुस्तक 'चरैवेति! चरैवेति!!' के संस्करण 11 भाषाओं में उपलब्ध। पुस्तक हिंदी, मराठी व अंग्रेजी भाषाओं में ब्रेल लिपि में नेत्रहीनों के लिए भी सुलभ।

Posted By: Umesh Tiwari

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