जम्मू-कश्मीर में एक तरफ जहां विकास की नई इबारत लिखने की कवायद तेज है वहीं राजनीतिक मंच भी गरमा रहा है और अनुच्छेद 370 को बहाल करने के लिए बयानबाजी भी तेज है। ऐसे में सक्रिय राजनीति से राजभवन पहुंचे जम्मू-कश्मीर के तेज तर्रार उपराज्यपाल मनोज सिन्हा सीधे तंज करते हुए कहते है- यह आरोप तो निराधार है कि वहां राजनीतिक गतिविधियां नहीं हो रही हैं। दैनिक जागरण के राष्ट्रीय ब्यूरो प्रमुख आशुतोष झा और विशेष संवाददाता नीलू रंजन से बातचीत में उपराज्यपाल कहते हैं- वक्त और जनता सबकी अहमियत तय करेगी। लेकिन हम इतना कह सकते हैं कि वहां ग्रासरूट चुनाव की तैयारी हो गई है। पालिटिकल वैक्यूम नहीं होगा। पेश है बातचीत का एक अंश: 

- अनुच्छेद 370 को रद हुए एक साल हो गए और बतौर उपराज्यपाल आपको भी तीन महीने। स्थितियां कितनी बदली हैं। हिंसक घटनाएं तो अभी भी हो रही हैं? 

जवाब- मैं इनकार नहीं करूंगा कि कुछ घटनाएं हो रही हैं। लेकिन पहले में और आज में काफी अंतर है। आज सुरक्षा बलों का अपर हैंड है। मुश्किल से 10 प्रतिशत आबादी है या 10 प्रतिशत क्षेत्र है, जहां आतंकवाद है। कुछ बाहरी ताकतें हैं, जो अशांति पैदा करने की बराबर कोशिश करती हैं। जैसी घटनाएं पहले हुआ करती थीं पिछले 14-15 महीनों में नहीं हुईं। वहां का सामान्य आदमी नया कश्मीर देखना चाहता है। जहां विकास के नए मापदंड स्थापित हो सकते हैं। 

-निश्चित रूप से पत्थरबाजी रुकी है, लेकिन स्थानीय युवाओं का आतंकी संगठनों में जाना नहीं रुका है? 

जवाब -मैं आपसे थोड़ा असहमत हूं। यह नहीं कहूंगा कि रूक गया है लेकिन पहले की तुलना में कम संख्या में लोग जा रहे हैं। 22-23 जुलाई की घटना है, सोपियां में तीन युवकों का एनकाउंटर हो गया था। मुझे जानकारी मिली कि इसमें कुछ ऐसी चीजें हैं, जिससे संदेह पैदा होता है, तो मैं परिजनों से मिलने खुद पहाड़ पर चलकर गया और मैंने वहां के नागरिकों को भरोसा दिया कि कोई गलत काम नहीं होगा। मैंने आर्मी चीफ से भी बात की। पुलिस को मैंने साफ निर्देश दिया है कि बेगुनाह को छेड़ो मत और गुनहगारों को छोड़ो मत। कश्मीर ने विश्वास बहाली की दिशा में भी एक लंबा सफर तय किया है। 

- क्या आपको लगता है कि जम्मू-कश्मीर में पुराना लीडरशीप हुर्रियत के रास्ते पर चल पड़ा है? गुपकार समझौता और उसके बाद फारूख अब्दुल्ला का चीन से मदद की बात। इसे कैसे देखते हैं? 

जवाब- मेरी चिंता का विषय यह नहीं है कि कौन क्या कहता है। जिन लोगों ने कभी भारत के संविधान की शपथ ली थी, देश उनसे अपेक्षा करता है कि मर्यादा और लक्ष्मण रेखा का ध्यान उन्हें रखना चाहिए। लेकिन यह जरूर कहूंगा कि पालिटिकल वैक्यूम नहीं रहेगा। पंचायतों के रिक्त पदों के साथ-साथ जिला विकास परिषद के चुनाव भी पहली बार हो रहे हैं। ग्रासरूट डेमोक्रेसी के लिए पंचायती राज संस्थाओं का मजबूत होना बहुत आवश्यक है। डिस्ट्रिक्ट डेवलपमेंट काउंसिल चुनाव से राजनीति की एक नई दिशा प्रारंभ होने जा रही है। 

- पीडीपी और नेशनल कांफ्रेस के स्थापित नेताओं से कभी आपका संवाद हुआ या इन लोगों ने कभी संवाद करने की कोशिश की? 

जवाब -सभी दलों के जिम्मेदार लोग मुझसे मिल चुके हैं और निरंतर मिलता रहता हूं। 20 में से 16 जिले हो आया हूं। सीधे लोगों से मिलता हूं। अनेक पूर्व मंत्री, पूर्व एमएलए, शायद ही किसी पार्टी के हों, जिनसे मैं अभी तक नहीं मिला हूं। दो-चार को छोड़ दीजिये तो मुझे लगता है कि सभी से मेरी भेंट हो चुकी है। 

- दो चार नेताओं में आप शायद पीडीपी और एनसी के शीर्ष नेताओं की बात कर रहे हैं। उन्हें क्यों वक्त नहीं दिया है?

जवाब- मुझसे जिसने समय मांगा है मैंने उसे दिया है। 

- विधानसभा चुनाव के लिए माहौल तैयार करने में तो इनका साथ चाहिए? 

जवाब: देश के प्रधानमंत्री लाल किला से साफ कर चुके हैं कि डिलिमिटेशन कमीशन अपना काम कर रहा है। उसके बाद चुनाव आयोग का काम है कि विधानसभा चुनाव कब कराएगा। लेकिन अनेक लोग भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। डिलिमिटेशन केवल जम्मू-कश्मीर का नहीं हो रहा है। इसके साथ ही तीन चार अन्य राज्यों का भी हो रहा है। 

- एक तरफ गुपकार वाले एकजुट हो रहे हैं, तो दूसरी ओर नए भूमि कानूनों के खिलाफ बंद का ऐलान भी है? 

जवाब- एक भ्रम फैलाने की कोशिश हो रही है कि बाहर से लोग आकर बस जाएंगे। यह सरासर झूठ है। नब्बे फीसद कृषि भूमि है, जिसकी एक इंच जमीन भी जम्मू-कश्मीर के बाहर के किसी आदमी को नहीं दी सकती है। इसके अलावा छह प्रतिशत सरकारी जमीन है जो किसी को मिल नहीं सकती है। केवल चार-पांच फीसद जमीन ऐसी है जो उद्योग-धंधों के विकास के लिए दी जा सकती है। इसका विरोध करने वाले बताएं कि सामान्य गरीब लोगों के रोजगार इलाज के लिए उद्योग और अस्पताल कहां लगेंगे। कुछ लोगों के बच्चे तो विदेश में पढ़ेंगे और उनके परिवार का इलाज विदेश में होगा। उच्च न्यायालय के फैसले को देखिए तो सबकुछ साफ हो जाएगा। न्यायालय ने उस रोशनी एक्ट को पूरी तरह अवैध घोषित कर दिया है जिसके तहत तीन लाख 48 हजार कनाल जमीन में से तीन लाख 46 हजार कनाल जमीन मुफ्त में बांट दी गई। अब प्रदेश के विकास के लिए जमीन दी जाएगी तो इसका विरोध। इसी मानसिकता ने प्रदेश को पीछे धकेल दिया था। 

- लेकिन राजनीतिक रूप से इन दलों का एकजुट होना क्या संकेत देता है? 

जवाब- मेरा काम राजनीतिक टिप्पणी करना नहीं है। ये आने वाला समय तय करेगा कि जनता किसे पसंद करती है। लेकिन इससे यह तो साफ है कि राजनीतिक गतिविधियों के लिए वहां पूरी आजादी मिली हुई है। लोग बैठकें कर रहे हैं, लोग बयान दे रहे हैं। (हंसते हुए) मुझे लगता है कि आप खुद ही समझ रहे होंगे कि अभी तक जो आरोप लगाए जा रहे थे, वह निराधार थे। 

-जिस तरह से फारुख अब्दुला या महबूबा मुफ्ती के बयान आ रहे हैं और उसे गैर संवैधानिक बताया जा रहा है उसे प्रशासन कैसे देखता है? 

जवाब -एक बात बहुत जिम्मेदारी से कहना चाहता हूं कि जो भी काम गैर कानूनी और गैर संवैधानिक होगा, उसको जरूर हम कानून और संविधान के दायरे में जरूर देखेंगे। 

-कश्मीर में 65 फीसद आबादी युवा है और बेरोजगारी भीषण है। इस आबादी को कैसे रोजगार देंगे?

जवाब- एक तथ्य मैं बताता हूं, बिहार में जितने सरकारी कर्मचारी हैं, लगभग वही संख्या जम्मू-कश्मीर में है। जबकि बिहार की आबादी जम्मू-कश्मीर से 11 गुना ज्यादा है। साफ है कि सरकारी नौकरी के अलावा वहां रोजगार के अवसर पिछले 70 सालों में पैदा नहीं होने दिये गए। भूमि कानून में सुधार मील का पत्थर साबित होगा। एक रोडमैप तैयार किया है। साथ ही जम्मू-कश्मीर के लिए हम नई औद्योगिक नीति लेकर आ रहे हैं। वित्त मंत्रालय ने इसे स्वीकृति दे दी है। सेव की खेती में आपको बड़ा अंतर दिखेगा। हमने यह कह दिया है कि सेव की खेती के लिए अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। पहले यहां भी रोक थी। हम पूरे प्रदेश के समानांतर विकास चाहते हैं। 

-एक सक्रिय राजनीतिज्ञ को राजभवन कितना रास आ रहा है? 

जवाब-अब मैं किसी राजनीतिक दल का सदस्य नहीं हूं। मेरी समझ से राजनीतिज्ञ का सबसे बड़ा काम समाज सेवा का है। राजभवन में भी आकर उस जिम्मेदारी को मैं समझ रहा हूं। मेरी जितनी क्षमता व बुद्धि है, जम्मू-कश्मीर को राष्ट्रीय फलक पर लाने की कोशिश कर रहा हूं। 

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