लखनऊ, जेएनएन। देश में आर्थिक मंदी को लेकर जो हो-हल्ला मचा है, उससे संशय खड़ा होना लाजिमी है कि यूपी डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर का भविष्य क्या होगा? राजधानी लखनऊ में सजने जा रहा डिफेंस इंडिया एक्सपो का मंच असमंजस की इस गर्द को काफी हद तक दबा सकता है। उद्यमी-निवेशक उस हकीकत से वाकिफ हो सकेंगे कि रक्षा उत्पादन प्रतिष्ठानों को सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम इकाइयों (एमएसएमई) की सख्त जरूरत है। बड़े-बड़े हथियार बनाने के लिए छोटे कलपुर्जों का संकट है। वे सुलभ हों तो राइफल-तोपें ज्यादा तेजी से गरज सकती हैं और काफी हद तक बेरोजगारी भी ढेर होने की संभावना है।

रक्षा उत्पादन क्षेत्र में अभी देशभर की लगभग तीन हजार एमएसएमई इकाइयां कार्य कर रही हैं। ये छोटी इकाइयां तमाम कलपुर्जे बनाकर बड़ी औद्योगिक इकाइयों और रक्षा प्रतिष्ठानों को सप्लाई करती हैं। इन्हीं में से करीब सात सौ कंपनियां पांच से नौ फरवरी तक लखनऊ में होने जा रहे डिफेंस एक्सपो में भी शामिल हो रही हैं। ये इकाइयां तो अपने उत्पाद प्रदर्शित कर दुनिया भर से आ रही कंपनियों में अपने ग्राहक तलाशेंगी, वहीं आयुध (हथियार) बनाने वाली भारतीय कंपनियां और रक्षा प्रतिष्ठान उन उद्यमियों की तलाश में होंगे, जो उन्हें जरूरत के कलपुर्जे उपलब्ध करा सकें।

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रक्षा उत्पादन इकाइयों से जुड़े सूत्र बताते हैं कि आयुध बनाने वाली बड़ी कंपनियां छोटे कलपुर्जों का उत्पादन नहीं करती हैं। तोप या कोई भी हथियार बनाने के लिए इनको 15 फीसद कलपुर्जे निजी छोटी कंपनियों से लेने पड़ते हैं। फील्ड गन फैक्ट्री के सेवानिवृत्त महाप्रबंधक शैलेंद्र नाथ ने बताया कि एमएसएमई रक्षा उत्पादन क्षेत्र की जरूरत है। छोटे पुर्जों की वजह से आयुध निर्माणियों के बड़े ऑर्डर फंसते हैं, जिनकी आपूर्ति छोटी इकाइयां कर सकती हैं।

शारंग बनाने में आई थी मुश्किल

दुनिया की आधुनिकतम तोप में शामिल शारंग को आयुध निर्माणी कानपुर और फील्ड गन फैक्ट्री ने मेक इन इंडिया प्रोजेक्ट के तहत मिलकर बनाया। निर्माण प्रक्रिया से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि शारंग में एक स्प्रिंग की जरूरत पड़ी। आसपास कोई कंपनी वह बनाती ही नहीं थी। बड़ी मुश्किल से उसका इंतजाम हो पाया, जिसकी वजह से निर्माण में विलंब हुआ।

छह माह तक लटक जाते हैं ऑर्डर

आयुध निर्माणियों को विभिन्न हथियार बनाने के लिए स्प्रिंग, पिन, वाशर, स्क्रू, गेसकेट, नट-बोल्ट, रॉड, स्ट्रिप, नोजल, ट्रिगर, कैम आदि बाहर से लेने पड़ते हैं। इनकी सप्लाई समय से न हो पाने से औसतन पांच से छह माह तक ऑर्डर विलंब से तैयार हो पाते हैं। साथ ही महंगी दरों पर नकद खरीद करनी पड़ती है।

Posted By: Umesh Tiwari

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