नई दिल्ली, [बिजेंद्र बंसल]। पूर्व केंद्रीय मंत्री बीरेंद्र सिंह बेटे बृजेंद्र सिंह के लिए कुर्बानी देने के बाद आजकल सियासी तौर पर बेचैन दिख रहे है। मोदी मंत्रिमंडल-दो में खुद या बेटे को स्थान नहीं मिलने के बाद उनके तेवर आक्रामक हो गए हैं। वह अपनी चिर-परिचित राजनीतिक शैली पर उतर आए हैं। वह सत्ता के केंद्र से दूर रहने के बाद अपने ही दल को किसी न किसी बहाने से कटघरे में खड़ा कर देते हैं। कांग्रेस में रहते हुए भी उन्‍होंने ऐसा किया था और अब भाजपा में भी उनका यही अंदाज सामने आया है। कांग्रेस में रहते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री भजन लाल और भूपेंद्र सिंह हुड्डा के खिलाफ उनकी मोर्चाबंदी बेशक अतीत है, लेकिन भाजपा में आने के बाद भी उन्होंने अपना मिजाज नहीं बदला है।

सत्तासुख के बिना बढ़ रही है राजनीतिक बेचैनी, हरियाणा की भाजपा सरकार पर साध रहे निशाने

मुख्यमंत्री मनोहर लाल की सरकार को राज्य में महिला सुरक्षा और बढ़ते अपराधों पर घेरते हुए उनके बयानों में जो टीस सामने आ रही है, उसके केंद्र में कहीं न कहीं केंद्रीय मंत्री पद भी है। इतना ही नहीं उनके समर्थकों को भी यह लगता है कि यदि बीरेंद्र सिंह वंशवाद के चक्कर में नहीं पड़ते तो मोदी मंत्रिमंडल-दो में भी वह किसी न किसी प्रभावी मंत्रालय में मंत्री होते। शायद यही बात बीरेंद्र सिंह को भी टीस दे रही है और उनका गुस्‍सा या 'खीझ' सामने आ रहा है।

राज्य सरकार की खामियां उजागर करने के नाम पर सामने आ रही है 'खीझ'  
मोदी मंत्रिमंडल-एक में बीरेंद्र सिंह पहले पंचायत विकास एवं ग्रामीण विकास मंत्री रहे और बाद में उनको इस्पात मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई। Lok Sabha 2019 के समय वह अपने आइएएस बेटे बृजेंद्र सिंह को नौकरी छुड़वाकर राजनीति में लेकर आए। बेटे की सियासी राह बनाने के लिए उन्‍होंने कुर्बानी दे दी। वंशवाद पर भाजपा के रुख को देखते हुए बेटे बृजेंद्र सिंह को हिसार से भाजपा का टिकट दिलाने के लिए उन्‍होंने केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। बीरेंद्र सिंह फिलहाल राज्यसभा सदस्य हैं।
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इस्तीफा देते समय राजस्थान, उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम भांपने में तो नहीं हुई चूक
बीरेंद्र सिंह के 2014 से पहले कांग्रेस में सियासी सफर को देखें तो वह अपने हिसाब से गुणा-भाग करके अपना राजनीतिक भविष्य तय करते रहे हैं। हालांकि,  सिर्फ 2014 में हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल होने के उनके निर्णय के अलावा अभी तक उनका कोई निर्णय बहुत सार्थक नहीं रहा। 1991 और फिर 2005 में राज्य में सीएम पद की दौड़ से बाहर रह गए बीरेंद्र सिंह को 1991 में लगता था कि तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी हरियाणा में सिर्फ उन पर ही भरोसा करेंगे।

इसके बाद 2005 में भी उन्हें यही भरोसा रहा कि तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी उनकी गांधी परिवार के प्रति निष्ठा काे ध्यान में रखेंगी, लेकिन दोनों ही बार उनकी उम्‍मीद टूट गई। सूत्र बताते हैं कि बीरेंद्र सिंह ने 2019 के लोकसभा चुनाव में भी जो राजनीतिक गणना की थी, उसमें उन्हें उत्तर प्रदेश या राजस्थान से उनके कद का जाट नेता जीतकर आने की उम्मीद नहीं थी। चूंकि, हरियाणा में लोकसभा के ठीक बाद विधानसभा चुनाव होने हैं इसलिए उन्हें अपने या बेटे बृजेंद्र सिंह के लिए मंत्री पद की कोई चुनौती दिखाई नहीं देती थी। राजस्थान से केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र शेखावत और उत्तर प्रदेश से संजीव बालियान की जीत ने भी उनका राजनीतिक हिसाब फेल कर दिया।

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