पटना, अरविंद शर्मा। बिहार की सियासत (Politics of Bihar) में जाति (Caste) एक कड़वी सच्‍चाई है, लेकिन पूरी तरह नहीं। जातीय जनगणना के लिए विधानसभा से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजने वाले बिहार की राजनीति में जातियों के आंकड़े हैरान करने वाले हैं। बिहार में सवा दो सौ से ज्यादा जातियां हैं, लेकिन इनमें मुख्य तौर पर 10-12 ही सक्रिय राजनीति में हिस्सा लेतीं हैं। टिकट के लिए मारामारी भी इन्हीं के बीच होती है। अन्य जातियों का स्थान दर्शक दीर्घा में होता है।

एक सच यह भी है कि आजादी से अबतक राज्य की 20 जातियों के प्रतिनिधि ही संसद (Parliament) तक पहुंच सके हैं। बाकी को सांसद बनने का मौका तक नहीं मिला है। हां, विधानसभा (Bihar Assembly) में यह फलक थोड़ा ही बड़ा है।

दो सौ जातियों का किसी सदन में प्रतिनिधित्व नहीं

जातीय जनगणना के सहारे अपने वोट बैंक में इजाफा की उम्मीद लगाने वाले दलों को यह आंकड़ा सबक देगा कि पिछले लोकसभा चुनाव में भी बड़े दलों ने सिर्फ 21 जातियों को ही टिकट के लायक समझा। यह बिहार में जातियों की कुल संख्या का महज 10 फीसद है। यानि 90 फीसद को टिकट का हकदार नहीं माना गया। करीब दो सौ जातियां हैं, जिनका प्रतिनिधित्व अभी तक किसी सदन में नहीं हो सका है।

बिहार को लेकर नजरिया बदलने की जरूरत

चुनाव सुधार के लिए काम करने वाली संस्था एडीआर के बिहार प्रमुख राजीव कुमार जाति के आधार पर वोट की तलाश करने वाले दलों को आगाह करते हैं। वे कहते हैं कि बिहार को लेकर नजरिया बदलने की जरूरत है। जाति सबसे ऊपर होती तो कर्पूरी ठाकुर, श्रीबाबू और नीतीश कुमार को इतनी प्रतिष्ठा नहीं मिलती, क्योंकि उक्त तीनों नेता जिस-जिस जाति का प्रतिनिधित्व करते आए हैं, उनकी संख्या बहुत कम है। लालू प्रसाद को कुछ हद तक इसलिए कामयाबी मिल गई कि उन्होंने जातियों का समीकरण बनाया था। लेकिन वोटरों की मानसिकता बदली तो उन्हें भी हाशिये पर जाते देर नहीं लगी।

जाहिर है, सबको सड़क, बिजली, पानी और बुनियादी सुविधाएं चाहिए। सुशासन चाहिए ताकि बेटियां घर से पढऩे निकले तो समय से सकुशल लौटें।

फलक बड़ा करें बिहार को जातीय चश्मे से देखने वाले

राजनीतिक विश्लेषक अजय कुमार कहते हैं कि बिहार को जातीय चश्मे से देखने वाले अपने फलक को बड़ा कर लें। अगर ऐसा होता तो जॉर्ज फर्नांडीज, मीनू मसानी, जेबी कृपलानी और मधु लिमये जैसे बाहरी नेताओ को बिहार से संसद जाने का मौका नहीं मिल पाता। बिहार के वोटरों ने उनकी जाति नहीं, संभावनाएं देखकर अपना प्रतिनिधि चुना।

अबतक केवल 20 जातियों को ही मिला मौका

श्रीकांत की पुस्तक बिहार में चुनाव, जाति और बूथ लूट के आंकड़े बताते हैं कि 1952 से अबतक यादव, ब्राह्मïण, राजपूत, कायस्थ, भूमिहार, कुर्मी, कोइरी, बनिया, कहार, नाई, धानुक, नोनिया, मल्लाह, विश्वकर्मा, पासवान, मांझी, पासी, रविदास, मुस्लिम और ईसाई समुदाय से ही सांसद चुने गए हैं। बाकी को इंतजार है।

राजनीति में अति सक्रिय जातियां

यादव, भूमिहार, ब्राह्मïण, राजपूत, कायस्थ, कोईरी, कुर्मी, दलित, बनिया, कहार, धानुक, मल्लाह

बिहार में कुल जातियां, एक नजर

एससी : 37

एसटी : 33

अति पिछड़ा : 113

पिछड़ा वर्ग : 31

सवर्ण : 7

Posted By: Amit Alok

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